जब हमारे विरुद्ध अपराध घटित हुआ है व हम पीड़ित हैं, फिर भी हमारी रिपोर्ट पर अपराध पंजीबद्ध न होना हमारी लाचारी व विवशता को दर्शाता है।कई बार अधिकारियों व नेताओं के चक्कर लगाने के बावजूद हमारी रिपोर्ट नहीं लिखी जाती है। क्या हमारे प्रजातंत्र का यही असली स्वरूप है ? क्या जिम्मेदार पदों पर बैठे अपने कर्तव्यों को इसी प्रकार नजरअंदाज करेंगे व उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा ? क्या हमारी सुनवाई होगी ?
उच्चतम न्यायालय द्वारा ललिता कुमारी विरुद्ध उत्तर प्रदेश शासन में स्पष्ट निर्देश है कि संज्ञेय अपराध की रिपोर्ट होने पर पुलिस को प्राथमिकी लिखना ही होगी।इसके बावजूद जमीनी हकीकत में कोई सुधार परिलक्षित नहीं हो रहा है। क्या इसे कानून का राज्य कहा जा सकता है ?

अपराध-मुक्त भारत का विचार हमें बिना पुलिस स्टेशन जाये अपराध पंजीयन की सुविधा दे रहा है। क्या यह सुविधा मात्र पढ़े-लिखे स्मार्ट फोन एवं कम्प्यूटर जानने वालों के लिये है या इसका लाभ गांव के अनपढ़ एवं सुविधाहीन लोगों को भी मिलेगा ? आइए इसे विस्तार से समझने की कोशिश करते हैं--
मैं आपको बताना चाहूँगा कि यह सुविधा सभी के लिये है।विशेषतौर पर सुविधाहीन व्यक्ति इसका लाभ आसानी से उठा सकेंगे। उन्हें मात्र एक बटन दबाने से यह सुविधा मिल सकेगी।सबसे पास का एक वालिंटियर अपने एप के साथ पहुँचेगा व एप में स्थित सॉफ्टवेयर के माध्यम से एक वर्चुयल पुलिस अधिकारी आपसे बात कर अपराध की पूरी जानकारी प्राप्त करेगा एवं कानून की धाराएँ लगायेगा। यह आपको हस्ताक्षर के कई विकल्प भी देगा।जैसे—मोबाइल स्क्रीन से ऑप्टीकल हस्ताक्षर, फोटो सिग्नेचर, आधार नंबर से ओटीपी आधारित हस्ताक्षर।विदेशी नागरिक होने पर  पासपोर्ट वेरीफाइड हस्ताक्षर को रीयल टाइम के आधार पर दिनांक, समय, लोकेशन के स्टेम्प के साथ हैस वेल्यू से लॉक और इनक्रिप्ट कर सीसीटीएनएस के माध्यम से क्षेत्राधिकार वाले प्रभारी के डेस्कटॉप या एप पर पहुँच जायेगा व थानाप्रभारी के हस्ताक्षर के उपरांत यह कानूनी प्राथमिकी (FIR) बन जायेगी।

यहाँ थाना प्रभारी के सहमत न होने पर उसे असहमति के कारण दर्शाने होंगे उस स्थिति में सिस्टम सी.सी.टी.एन.एस. के माध्यम से पुलिस अधीक्षक के डेस्कटॉप पर अवतरित हो जायेगा व पुलिस अधीक्षक को सेक्शन 154 (3) दण्ड प्रकिया के तहत कानूनी दायित्व का निर्वहन करने का अवसर देगा व पुलिस अधीक्षक के हस्ताक्षर के उपरांत यह FIR बन जायेगी। यदि कपितय कारणों से वह भी सहमत नही होने पर उन्हें भी कारण दर्शाने होंगे।

उस स्थिति में सिस्टम एप के माध्यम से पुन: शिकायत कर्ता के पास पहुँचकर शिकायत के तथ्यों की पुष्टि करेगा व आगे कार्यवाही की सहमति प्राप्त करेगा व शिकायत कर्ता के लिये एक एफीडेबिट जनरेट करेगा जिसे डिजिटली हस्ताक्षरित होने के बाद आइ.सी.जे.एस. का उपयोग करते हुए क्षेत्राधिकार के मजिस्ट्रेट के सेक्शन 156(3) दण्ड प्रक्रिया संहिता के आदेश से FIR में रूपान्तरित करेगा एवं अत्यंत विषम परिस्थितियों में सेक्शन 482 दण्ड प्रक्रिया संहिता  के तहत हाई कोर्ट से आदेश प्राप्त कर इसे FIR में परिवर्तित करगा व शिकायत गलत होने पर 182, 211 भा.द.वि. के तहत कार्यवाही सुनिश्चित करेगा।इस तरह बिना भटके अपने स्थान से ही FIR दर्ज कराना सुनिश्चित हो सकेगा ।

इस प्रकार अपराध-मुक्त भारत की यह संकल्पना व्यावहारिक और संभव है, इसलिए इसे हम सबको मिलकर कार्यान्वित करना चाहिए।जय हिन्द।यह भारत।
(मैथिली शरण गुप्त सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक [पुलिस सुधार], मप्र शासन, भोपाल और क्राइम-फ़्री भारत मिशन, भोपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष  हैं।)