ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

सम्मान्य गुरु जी।माने विष्णु चिंचालकर जी। अज्ञानवश पता नहीं चला, गत 30 जुलाई 2020 को उनकी बीसवीं पुण्यतिथि थी।और तीन वर्ष पूर्व 5 सितंबर 2017 को उनका जन्म शताब्दी वर्ष निकल गया।हमने तो उसे मनाया भी नहीं।और अब उन्हें याद कर रहे हैं।
सहजता, सरलता और सादगी।यह गुरु जी की पहचान थी, यही उनका परिधान था और यही उनका व्यक्तित्व था।कल रात को फ़ेसबुक पर मैंने गुरु जी को याद करने वाली राजेन्द्र कोठारी जी की पोस्ट देखी, जिसमें 100 से अधिक लोगों ने गुरु जी को श्रद्धांजलि अर्पित की।पर इसमें उनके जीवन, व्यक्तित्व, कृतित्व और कला में उनके समग्र अवदान पर कोई चर्चा नहीं थी।कोई हर्ज नहीं, पर कम-से-कम उन्हें याद तो किया गया।यह भी कम महत्वपूर्ण नहीं है।अलबत्ता, इसमें अकेले अशोक वाजपेयी ने उनके बारे में चार लाइनें भी लिखीं हैं।वाजपेयी जी ने कहा कि वे विनम्रता के कलाकार थे।यह सच है।वाजपेयी जी उनके काफ़ी निकट रहे हैं।इसलिए वे उन्हें भली प्रकार से जानते थे।
गुरु जी के बारे में एक उल्लेखनीय तथ्य है कि गुरुजी के मित्र भी गुरु जी जैसे ही विनम्र, शालीन, सहज एवं सरल थे और सादगी का जीवन पसंद करते थे।उनके सहित उनकी मित्र मंडली में कुल पाँच सदस्य थे।इनमें से तीन बाबा थे।पहले बाबा यानी राहुल बारपुते, दूसरे बाबा यानी बाबा डिके और तीसरे बाबा यानी बाबा आमटे।उनके चौथे मित्र पं. कुमार गंधर्व थे।हुसैन, रजा, बेंद्रे और देवलालीकर गुरु जी से सीनियर थे।
मालवा की माटी के गुरु जी ने बाकी सभी की तरह जेजे स्कूल ऑफ़ आर्ट्स, बम्बई से चित्रकला की उच्च शिक्षा प्राप्त की।
विष्णु चिंचालकर जीवन और प्रकृति के चित्रकार थे।यदि प्रकृति को प्रकृति के अलावा कहीं और देखना है, तो गुरु जी के चित्रों में देखा जा सकता है।इन दोनों ही विषयों को उन्होंने अपनी एक नई दृष्टि दी। यही कला-दृष्टि उन्हें विलक्षण बनाती है।इस कला-दृष्टि ने गुरु जी को देश में बहुत शोहरत दी।
बाद में उन्होंने इंदौर आकर अध्यापन भी किया और यहीं से वे गुरु जी कहलाए।अध्यापन के लिए उन्हें देश के और भी स्थानों से प्रस्ताव आए, लेकिन गुरु जी ने इंदौर को ही चुना।
गुरु जी के साथ के कई संस्मरण याद आ रहे हैं।कुछ इंदौर के, लेकिन ज़्यादातर भोपाल के।गुरुजी प्रायः भोपाल आते, तो नईदुनिया के प्रोफ़ेसर कॉलोनी वाले ऑफ़िस में निर्मित गेस्टहाउस में रुका करते थे।मैं तब नईदुनिया में ही था।कार्यालय के सहायक लक्ष्मण वाणी से जानकारी मिल जाया करती थी कि गेस्टहाउस में कौन आए हैं।वर्ष 1984 की—2 और 3 दिसंबर की दरमियानी रात।भोपाल की यूनियन कार्बाइड फ़ैक्ट्री से ख़तरनाक गैस एमआइसी यानी मिक यानी मिथाइल आइसो साइनेट की रिसन हुई।विश्व की सबसे बड़ी मानव निर्मित औद्योगिक दुर्घटना।जिसमें 5 हज़ार लोग मारे गए और लाखों बीमार हुए।मिक गैस प्रोफ़ेसर कॉलोनी तक पहुँची थी, जहाँ नईदुनिया कार्यालय भी था।गुरु जी भी उस समय भोपाल में नईदुनिया के गेस्टहाउस में थे।गेस्टहाउस में ऊपर गुरु जी थे और नीचे लक्ष्मण वाणी का परिवार।
गुरु जी ने ख़तरनाक स्थिति को भाँप लिया और उन्होंने तत्काल लक्ष्मण से कहा कि साफ़ कपड़ा गीला करके उसे अपने चेहरे पर लगा लो तथा दरवाज़े-खिड़की अच्छे से बंद कर लो।यही बचने का एकमात्र उपाय है।यह उपाए रामबाण सिद्ध हुआ।सभी बच गए और गैस का कोई दुष्प्रभाव नहीं हुआ।सुबह जब हम लोग कार्यालय पहुँचे, तो गुरु जी और लक्ष्मण से सब-कुछ पता चला कि किस प्रकार उन्होंने अपने-आपको गैस से बचाया।कला के साथ-साथ गुरु जी में तत्काल सही निर्णय लेने का कौशल भी था।
गुरु जी के चरणों में सादर नमन।