ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

अभी एक यह विषय आया कि प्रधानमंत्री के चाहे जितने कार्टून बनाओ, क्या फ़र्क पड़ता है ? फ़र्क तो तब पड़ेगा, जब आप किसी को भी उठाकर प्रधानमंत्री बना देंगे ! पहले यह बहस ख़ूब चली कि एक चाय वाले को प्रधानमंत्री बना दिया।बहुत तक़लीफ थी इस बात की कि यह क्या हो गया ? वे बड़ी-बड़ी हस्तियाँ, जो चाय बनाकर नहीं बेच रही थीं, उन्हें किसने रोका था प्रधानमंत्री बनने के लिए ? लोगो को भले तकलीफ़ हो रही थी, मगर इधर तो कमाल हो गया।उस पूर्व चाय वाले ने इस तक़लीफ को ही भुना लिया। अब आप बनाते रहो कॉर्टून!
अभी बीच में बड़ा हल्ला मचा।भय का वातावरण है।असहिष्णुता का वायुमंडल है।हिंदू राष्ट्र बनाने की तैयारी है।अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है।सवाल उठाने की आज़ादी छीनी जा रही है। अघोषित आपातकाल लागू हो गया है। मैंने पता किया, तो मालूम पड़ा कि ऐसा कुछ भी नहीं है।कहीं भी भय नहीं है।लोग हद से ज़्यादा निर्भीक हैं, दंगे कराने की हद तक।कुछ भौंकने में ‘व्यस्त’ हैं।कुछ दहाड़ने की ड्रामेबाज़ी कर रही हैं।सहिष्णुता का लेवल अपने सामान्य स्तर पर है।बल्कि एक-दो बार तो सामान्य से दो-तीन डिग्री अधिक ही रहा है।हाँ, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता इस क़दर ज़रूर है कि लोग अपनी सीमाएँ तक भूल चुके हैं।अल्पसंख्यकों के लिए जो साधन, सुविधा और आज़ादी है, वह दुनिया में कहीं नहीं मिलेगी।कोई बंधन नहीं है, कोई रोक-टोक नहीं है।जब इस देश में ओवैसी-बंधु भड़काने वाला भाषण बंद कर देंगे, तब मैं मानूँगा कि शायद इस देश में ज़बानों पर ज़रा लगाम लगायी गई है।
शायद इस देश में कुछ लोग आपातकाल के दिनों की यादों को भुला चुके हैं।यदि उन्होंने नहीं भुलाया होता, तो शायद आज वे यह बात नहीं कहते।आज तो धड़ल्ले से कार्टून बनाए जा रहे हैं।प्रधानमंत्री के कार्टून ख़ूब बन रहे हैं।कहाँ है अघोषित आपातकाल ? क्या खूब जोक नहीं बन रहे ? सोशल मीडिया पर गालियाँ नहीं बकी जा रहीं हैं ? आखिर और कौन-सी आज़ादी चाहिए ? हिंदू राष्ट्र भी घोषित नहीं हुआ है, फिर इतनी घबराहट और छटपटाहट क्यों हो रही है ? कोई बता रहा था कि यह घबराहट राजनीतिक है।
शायद 45 साल बाद आज वह समय आ गया है, जब यह याद दिलाया जाए कि 25 और 26 जून 1975 की दरमियानी रात को भारत में अब तक का सबसे बड़ा और डरावना अलोकतांत्रिक क़दम—आपातकाल लगाने की घोषणा की गई थी और 26 जून 1975 को इसके प्रावधान लागू कर दिए गए थे।
संविधान की धारा 352 के अंतर्गत जब आपातकाल लागू किया गया और  उसके जो प्रावधान प्रभावशील किए गए थे, उसमें से कुछ महत्वपूर्ण प्रावधानों को यहाँ निश्चय ही रेखांकित कर देना चाहिए। सर्वप्रथम इसमें नागरिकों के मौलिक अधिकार समाप्त कर दिए गए थे।प्रेस के लिए विशेष आचार सँहिता लागू कर दी गई थी।इसका मतलब यह है कि प्रेस सेंसरशिप को प्रभावशील किया गया था।विरोधी दलों के नेताओं को गिरफ़्तार कर जेल में डाल दिया गया था।यह आपातकाल 25 जून 1975 से 21 मार्च 1977 तक लागू रहा।यानी 21 महीने।
तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के लिए यह आपातकाल लगाना कितना आवश्यक था, वह समझना भी दिलचस्प है।हालाँकि यह किसे नहीं मालूम, फिर भी उल्लेखनीय है।दरअसल 12 जून 1975 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने इंदिरा गांधी का रायबरेली लोक सभा क्षेत्र का चुनाव निरस्त कर उन पर छह साल तक चुनाव लड़ने से प्रतिबंध लगा दिया था और उनके प्रतिद्वंद्वी राजनारायण को विजयी घोषित कर दिया था।यह ऐतिहासिक फैसला जस्टिस जगमोहन लाल सिन्हा ने दिया था।फ़ैसले में कहा गया था कि इंदिरा गांधी ने चुनाव लड़ने के लिए अनुचित साधनों का इस्तेमाल किया था।यह चुनाव 1971 में लड़ा गया था, लेकिन चार साल बाद राजनारायण ने हाईकोर्ट में इसके ख़िलाफ़ याचिका लगायी थी।
आपातकाल की रात आकाशवाणी ने देश को बताया कि—“अनियंत्रित आंतरिक स्थितियों”—के कारण देश में आपातकाल लगाया गया है।इंदिरा गांधी ने आकाशवाणी पर अपने संदेश में कहा कि—“जब से मैंने आम आदमी और महिलाओं के लिए कुछ प्रगतिशील क़दम उठाए हैं, तभी से मेरे ख़िलाफ़ साज़िश रची जा रही है।”
5 जून 1974 को पटना के गाँधी मैदान में, पाँच लाख लोगों की सभा में जयप्रकाश नारायण ने देश के बिगड़ते हालात को देखते हुए संपूर्ण क्रांति आंदोलन की घोषणा की थी।25 जून, 1975 को दिल्ली की रैली में जय प्रकाश नारायण ने पुलिस और सेना के जवानों से आग्रह किया कि वे सरकार के असंवैधानिक आदेश को मानने से इंकार कर दें।मतलब 5 जून 1974 को संपूर्ण क्रांति की घोषणा, 12 जून 1975 को इलाहाबाद हाईकोर्ट का फ़ैसला और 25 जून 1975 को पुलिस एवं सेना के जवानों से आग्रह के बाद—सत्ता को बचाने के लिए इंदिरा गांधी के सामने आपातकाल ही एकमात्र विकल्प था।अगले वर्ष 1976 में लोकसभा के चुनाव होना थे, इसलिए अभी आपातकाल लगाने से बेहतर उनके लिए और कुछ नहीं था।
नरेंद्र मोदी जब सत्ता में आए, तब लालकृष्ण आडवाणी ने आपातकाल की आशंका व्यक्त की थी, लेकिन उन्होंने तो उसे कोरोनाकाल में भी प्रभावशील नहीं किया।
मैं 72 साल के ख़िलाफ़ नहीं हूँ और न ही 6 साल के समर्थन में हूँ।दोनों की ही आलोचना और प्रशंसा के ढेरों तर्क हैं।लेकिन यहाँ प्रश्न कार्टून से शुरू हुआ और आपातकाल तक पहुँच गया।यदि कार्टून बनाए जा रहे हैं, तो इसका मतलब है कि आपातकाल नहीं है। कभी-कभी तो आपातकाल नहीं होने के बावजूद कार्टूनिस्टों को अपनी अभिव्यक्ति के कारण जेल जाना पड़ा है।मसलन असीम त्रिवेदी।हमारे यहाँ तो कार्टूनों का बड़ा  शानदार इतिहास रहा है।के शंकर पिल्लई, आरके लक्ष्मण, अबु अब्राहम, ओवी विजयन, जी अरविंदन, येसुदासन, बापू, काक, प्राण, शिवराम दत्तात्रेय, एमबी गफ़ूर, शेखर गुरेरा, सुरेंद्र, केशव, सात्विक, राजेंदर पुरी, आबिद सुरती, सुधीर तैलंग, सुधीर दर, मंजुला पद्मनाथन, सतीश आचार्य वगैरह।राजनीति में रहते हुए बाल ठाकरे स्वयं अच्छे कार्टूनिस्ट थे।इतना ही नहीं, उनके भतीजे राज ठाकरे आज भी कार्टून बनाते हैं।हमारे मध्य प्रदेश में देखें, तो देवेंद्र, हाड़ा, लहरी और हरिओम हैं।
कुल मिलाकर व्यक्ति, जीवन, समाज और देश की परिस्थितियों को कार्टून से बाहर निकलना होगा।कार्टून तो बनते रहेंगे, लेकिन हम इन सभी को बहुत लंबे समय तक कार्टूनों में रख नहीं सकते।सभी को मिलकर देश और समाज का निर्माण नए सिरे से करना होगा।हमने अपने संविधान से काफ़ी स्वतंत्रता प्राप्त की है।एक अपवाद को छोड़ दें, तो हम प्रजातंत्र में हैं और वह क़ायम भी रहेगा।लेकिन यदि प्रजातंत्र को उसकी नकारात्मक पराकाष्ठा पर पहुंचाया गया, तो जान लीजिए कि वहाँ से ही अराजकता का जन्म होता है।थोड़ा-थोड़ा यह दिखाई भी देने लगा है। आपातकाल के 45 साल बाद यही कहा जा सकता है।