ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

श्री धीरेंद्र कुमार—पूरी तरह हिंदी थियेटर को समर्पित उज्जैन का पहला नाम।देश के प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली (एनएसडी) से अभिनय का प्रशिक्षण प्राप्त करने वाले मध्य प्रदेश के पहले रंगकर्मी(1978)। प्रयोगधर्मी नाटकों के प्रदर्शन से अपनी पहचान बनाने वाले मध्य प्रदेश के पहले नाट्य निर्देशक।मध्य प्रदेश के पहले कलाकार, जिन्होंने म. प्र. कालिदास संस्कृत अकादमी, उज्जैन में प्रवेश किया।और हम सब को बीच में ही छोड़कर चले जाने वाले मित्र भी सबसे पहले।
कल धीरेन्द्र जी की पुण्यतिथि थी।आज जब नवीन जी ने इसका ज़िक्र किया, तो मैं फ्लैशबैक में चला गया।मुझे तत्काल याद आया कि जब उनका अवसान हुआ था, तभी मैंने एक लेख लिखा था और वह नईदुनिया में प्रकाशित हुआ था।तब मैं नईदुनिया में, इंदौर में था।नईदुनिया के 11 सालों के सेवाकाल में मैं आख़िरी का एक वर्ष इंदौर में रहा।मुझे अखबार के समाचार से ही उनकी दुर्घटना में निधन की जानकारी मिली।भरोसा करना मुश्किल हो रहा था।बार-बार उस ख़बर को पढ़ा और विश्वास करना पड़ा।यह बात 1994 की है।मध्य प्रदेश और ख़ासकर उज्जैन की यह क्षति, अभी भी एक बड़ी क्षति है, जिसकी भरपाई कभी नहीं हो सकेगी।
भरपाई नहीं हो पाने के अनेक कारण हैं।सबसे बड़ा कारण यह है कि धीरेंद्र कुमार ने मध्य प्रदेश में एक ऐसे रंगकर्मी के रूप में अपनी पहचान स्थापित की, जो प्रयोगधर्मी नाटकों में सबसे सफल और अग्रणी रहे हैं।मेरी-अपनी दृष्टि तो यही है।मैंने देश के अनेक नाट्य निर्देशकों के प्रयोगधर्मी नाटक देखे हैं।मैंने बंसी कौल का अंधायुग भी देखा, जो नितांत प्रयोगधर्मी था।उस वक़्त मैंने उस पर समीक्षा भी लिखी थी।लेकिन मेरा मानना है कि धीरेन्द्र जी अपने नाट्य प्रयोगों में इस बात का विशेष ध्यान रखते थे कि दर्शक बँधे रहें।रंग-प्रयोग का अर्थ यह नहीं है कि हम इसके नाम पर नाटक में ऐसा कुछ करें, जिससे नाटक में चमत्कार पैदा हो जाए—भले ही दर्शक उठकर जाने लगें।धीरेन्द्र जी के नाटकों में ऐसा नहीं था, ख़ासकर प्रयोगात्मक नाटकों में।दूसरी बात, धीरेन्द्र जी रंगकर्म के राष्ट्रीय क्षितिज पर उभर रहे थे,  लेकिन दुर्भाग्य से सूर्यास्त हो गया।मैं उन्हें उज्जैन के थियेटर का पहला ऐसा रंगकर्मी भी मानता हूँ, जो अपने इस कला-धर्म में जीवनव्रती हो चुके थे।मतलब पूर्णकालिक रंगकर्मी।हिंदी रंगमंच न ही उनका ध्येय था।वे शौक़िया से आगे बढ़कर समर्पण की स्टेज पर आ चुके थे वे शौक़िया से आगे बढ़कर समर्पण की स्टेज पर आ चुके थे।
राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, नई दिल्ली से उज्जैन लौटकर धीरेंद्र भाई नए अवतार में थे और उनके भीतर अच्छे-अच्छे नाटकों की प्रस्तुतियाँ करने और एक से बढ़कर एक, नित-नए रंग-प्रयोग करने की ललक थी। और वे पूरे जोश और उत्साह के साथ अपने नए रंग-अभियान में जुट गए थे।लेकिन पत्रकारिता को मुसलसल जारी रखने के लिए 1980 में मैं बंबई चला गया था।और इधर उज्जैन में 1979 में धीरेंद्र भाई का कालिदास अकादमी में शोध सहायक के पद पर चयन हो गया।अकादमी के पहले निदेशक, रंगमंच की विभूति आद्य रंगाचार्य थे।उन्‍होंने ही इंटरव्यू लिया था।धीरेन्द्र जी की नियुक्ति का आदेश हमारे इस ग्रुप के विद्वान सदस्य जवाहर कर्नावट ने जारी किया, जो उस समय अकादमी के निदेशक के सहायक थे।
एनएसडी से  लौटकर और अकादमी से जुड़कर धीरेंद्र जी ने पूरे 15 साल पूरी ताक़त से थियेटर किया।वे उज्जैन के रंगमंच के चहेते सितारे बन चुके थे।लेकिन एनएसडी और अकादमी से जुड़ने के पहले का जो एक दशक था, उसमें भी धीरेंद्र जी ने श्रेष्ठ रंग कर्म किया।अभिनय में उनकी छवि एक प्रेमी-नायक की थी।हिंदी ही नहीं, संस्कृत नाटकों में भी उनकी यह छवि क़ायम रही।वे एक उदात्त प्रेमी की भूमिका का निर्वहन अत्यंत सफलतापूर्वक करते थे।
80 के दशक में मैंने उनके साथ सबसे पहले अंधा युग में काम किया।निर्देशक थे जानेमाने फ़िल्म अभिनेता और नाट्य निर्देशक और हमारे ग्रुप के सदस्य राजेंद्र गुप्त जी।इसके बाद धर्मवीर भारती का नाटक था—नदी प्यासी थी।इसमें धीरेन्द्र जी और देवेन्द्र जी दोनों थे और निर्देशन धीरेन्द्र जी का ही था।उन्होंने जापानी लोक नाट्य शैली—नोह और क़ाबुकी में जो नाटक पेश किए, वह उज्जैन के रंगमंच पर एक अच्छा प्रयोग था।प्रयोगधर्मी नाटकों और ख़ासकर कविताओं के नाट्य प्रयोग की बात जब चलती है, तो मैं अक्सर तीन नाटकों का उल्लेख करता हूँ। एक तो धीरेन्द्र जी के उपरोक्त जापानी नाट्य प्रयोग का।दूसरा डॉ. राम राजेश मिश्र के एक प्रयोगधर्मी नाटक का, जो वास्तव में कविताओं की नाट्य प्रस्तुति थी—कुदालों से खोदा गया अंधेरा।यह दरअसल स्व. सुभाष दशोत्तर की कविताओं का नाट्य प्रयोग था।तीसरा प्रयोग मैंने स्वयं प्रो. प्रदीप सिंह राव के साथ मिलकर किया था— समय के स्वाद की स्मृतियाँ।यह स्व. चंद्रकांत देवताले की कविताओं और सुरेंद्र वर्मा के नाटक मरणोपरांत को मिलाकर तैयार किया था।मैंने और प्रदीप ने ही अभिनीत और निर्देशित किया।
श्री धीरेन्द्र कुमार हमेशा याद रहेंगे।हिंदी थियेटर में उनकी स्मृति चिरस्थाई रहेगी।धीरेंद्रकुमार की स्मृति को चिरस्थाई तभी बनाया जा सकता है, जब हम वहाँ पर कोई एक ऐसा समवेत अभिनव प्रयास करें, कोई ऐसी स्थापना करें, जिससे उन्हें रंगकर्म की भविष्य की पीढ़ियाँ याद रखें।इस महती कार्य के लिए सबसे पहले उज्जैन के कलाकारों को आगे आना होगा।”हम विक्रम” ग्रुप उनके साथ होगा। पुनः धीरेन्द्र जी की पावन स्मृति को आदर के साथ प्रणाम !