ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

सुशांत सिंह राजपूत के वक़्त से पहले इस फानी दुनिया को अलविदा कह देने के बाद कई सवाल हमारे बीच उपस्थित हो गए हैं, हालाँकि इनमें से कुछ समय-समय पर उठते रहे हैं।सुशांत की आत्महत्या को आज एक हफ़्ता हो गया।आज मैं इस पर कुछ ख़ास मुद्दे उठाऊँगा और अपनी बात काफ़ी तफ़सील से रखूँगा।
आरोप लगाया जा रहा है कि सुशांत की मौत के पीछे फ़िल्म इंडस्ट्री है, जहाँ पर कई काकस काम करते हैं।ये हैं—फ़िल्मों के बिग प्रोडक्शन हाउस यानी कार्पोरेट, कलाकारों के ख़ानदान और बड़े फ़िल्म डायरेक्टर। इसमें कुछ बड़े नाम हैं—सलमान ख़ान, संजय लीला भंसाली, आदित्य चोपड़ा, करण जौहर, महेश भट्ट, आलिया भट्ट और एकता कपूर आदि।फ़िल्मों के ये बड़े प्रोडक्शन हाउस हैं।ये सूची वैसे तो काफ़ी लंबी है, लेकिन आरोप उपरोक्त प्रोडक्शन हाउस पर लगे हैं कि ये जब चाहे किसी को उठा देते हैं और जब चाहे किसी को गिरा देते हैं।पचास-साठ सालों से ये खेल चल रहा है।यहाँ पर बाहर से आए कलाकारों को सफल नहीं होने दिया जाता।सुशांत बिहार से आए थे।इन्होंने सुशांत को आत्महत्या के लिए विवश किया, इसलिए यह एक तरह से हत्या है।इस मामले में मुज़फ़्फ़रपुर, बिहार के मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी की कोर्ट में एक परिवाद दाख़िल किया गया है और कँगना रनौत एवं सुशांत के पिता केके सिंह के बयानों को आधार बनाया है।भोपाल में भी मध्य प्रदेश राजपूत समाज ने सुशांत के पक्ष में और फिल्म निर्माताओं के ख़िलाफ़ हबीबगंज थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाई और पूरे घटनाक्रम की सीबीआई से जाँच कराने की माँग की है, जिसमें मुख्य आरोपी करण जौहर को बनाया गया है।
इस हादसे के बाद पहला बयान कँगना का आया।उन्होंने कहा कि इस मौत के पीछे फ़िल्म इंडस्ट्री का हाथ है।कँगना के मुताबिक़ सुशांत कहता था कि मेरी फ़िल्में देखो, मेरा कोई गॉडफादर नहीं है, मुझे इंडस्ट्री से बाहर निकाल दिया जाएगा।इसके बाद इधर शेखर कपूर ने कहा है कि मुझे पता है सुशांत की मौत के लिए कौन ज़िम्मेदार है।जो कुछ भी हुआ वे किसी और के कर्म थे, तुम्हारे नहीं।उन्होंने कहा कि वह जिन लोगों से दु:खी था, उस पर मेरे कंधे पर सिर रखकर रोता था।यदि मैं पिछले छह महीने उसके साथ होता, तो शायद यह घटना नहीं होती।और अब सोनू निगम खुलकर सामने आ गए हैं।सोनू निगम ने तो यह भी भविष्यवाणी कर दी है कि कहीं और लोग सुसाइड न कर लें।उन्होंने अपने वीडियो में अभिनेताओं के अलावा गायकों, कंपोजरों, निर्माता और निर्देशकों के साथ हो रहे कथित अन्याय का मुद्दा भी उठाया और कहा कि कुछ लोग अपने हिसाब से संगीत तैयार करवा रहे हैं।
दूसरी तरफ़ प्रोडक्शन हाउस की ओर से इस मामले में एक बयान फ़िल्म निर्माता और निर्देशक मुकेश भट्ट का है। उन्होंने कहा है कि जो हुआ, उसका मुझे पहले से अंदेशा था और मैंने ये बात अपने भाई महेश भट्ट को भी बतायी थी।मैं उन्हें अपनी आगामी फ़िल्म सड़क-2 के लिए लेना चाहता था और वे एक बार मेरे ऑफ़िस आए भी थे।लेकिन उनकी मानसिक परिस्थिति के बारे में मैंने उनसे इसलिए बात नहीं की, क्योंकि मेरी उनसे सिर्फ़ दो बार भेंट हुई थी।वे मेरे नज़दीकी नहीं थे।मुकेश भट्ट ने सुशांत को बायपोलर नामक मानसिक बीमारी होने की बात कही है, जो डिप्रेशन की एक स्टेज है।उन्होंने यह भी कहा कि सुशांत की स्थिति परवीन बाबी जैसी हो गई थी, जिनकी अवसाद की वजह से 2005 में मृत्यु हो गई थी।वे अपने फ़्लैट में मृत मिली थीं।
सबसे महत्वपूर्ण बात धर्मेन्द्र ने कही है।उन्होंने कहा कि —”मैंने खुद्दारी से यहाँ अपनी जिंदगी गुजारी है, यहाँ की कई नामचीन हस्तियों को सबक सिखाया है।लेकिन यह इंडस्ट्री जान देने लायक नहीं।और भी चीजें हैं जिंदगी में करने के लिए।मैंने यहाँ काफी नाम कमाया और शोहरत पाई है, लेकिन किसी के आगे झुका नहीं।ये लोग ऐसे हैं भी नहीं कि इनके आगे झुका जाए।” धर्मेंद्र ने इसे और भी स्पष्ट किया और कहा कि जो इंडस्ट्री में नए लड़के-लड़कियाँ आ रहे हैं और जो आने के लिए तड़प रहे हैं, मैं उन्हें ये पैग़ाम देना चाहता हूँ, अपनी आपबीती सुनाना चाहता हूँ, एक सबक़ देना चाहता हूँ।इंडस्ट्री के ये लोग पर्दे पर जज्बात बाँटते हैं, लेकिन इनके भीतर जज्बात नहीं होता।मैंने यहाँ पर ऐसे लोगों को सबक़ सिखाया, जिनके अंदर “मैं” होता था।उन्होंने नयी पीढ़ी से कहा कि यह इंडस्ट्री ऐसी नहीं है कि इसके लिए अपनी जान दे दी जाए।हज़ार रास्ते हैं ख़ूबसूरत ज़िंदगी जीने के लिए।
बायपोलर और डिप्रेशन की बात हम बाद में करेंगे, इससे पहले सुशांत के फ़िल्मी करियर और फ़िल्म इंडस्ट्री में अन्य कलाकारों की स्थिति पर प्रकाश डालेंगे।
आरोप है कि मुंबई वाले फ़िल्मी ख़ानदान और प्रोडक्शन हाउस—बाहर वालों को यानी आउटसाइडर को इंडस्ट्री में पाँव जमाने नहीं देते हैं।पर यदि पुराने ज़माने की बात करें तो पहला नाम धर्मेंद्र का है।धर्मेंद्र के ज़माने से लेकर अभी आयुष्मान खुराना, कार्तिक आर्यन, राजकुमार राव और विक्की कौशल के आज के ज़माने तक इंडस्ट्री में इतनी बड़ी संख्या में बाहर के स्टार आए हैं और उन्होंने अपना स्थान बनाया है।इसके अलावा सुपरस्टार राजेश खन्ना हैं।विनोद खन्ना भी हैं।अब तक का सबसे बड़ा नाम, वास्तविक सुपरस्टार अमिताभ बच्चन।ये वो शख़्स हैं, जिन्हें आकाशवाणी ने रिजेक्ट कर दिया था।गोविंदा, अनिल कपूर और अक्षय कुमार भी हैं, जिन्होंने अपने दम पर अपना आभा-मंडल और स्टारडम क़ायम किया।लॉकडाउन में रिलीज़ हुई अमिताभ की फ़िल्म—गुलाबो-सिताबो हिट हो गई और आयुष्मान भी फिर चमक उठे।इस महानायक से सबक़ लेने और सीखने की ज़रूरत है। ऐसा ही एक मुकम्मल स्थान रणबीर सिंह ने भी बनाया है। यह चर्चा अधूरी होगी, यदि इसमें संजय दत्त का नाम शामिल नहीं किया। वे स्टार पुत्र है।उनकी ज़िंदगी में बहुत तूफ़ान आए। लेकिन वे हर बार उबरकर बाहर निकल आए। छोटे-छोटे हीरो बिना अपनी ज़मीन छोड़े जैसे-तैसे आगे बढ़ जाते हैं—अपने एक हाथ में कामयाबी का झंडा और दूसरे हाथ में संघर्ष की मशाल थामे।

इंडस्ट्री के नए नायकों की एक ही ख़्वाहिश रहती है कि उन्हें कुछ ख़ास प्रोडक्शन हाउस और कुछ ख़ास फ़िल्म निर्देशकों के साथ काम करने का मौक़ा मिले।यानी वे उनके बैनर में हीरो बनें।इसमें सबसे पहला नाम है निर्माता-निर्देशक राजकुमार हिरानी का।इसके अलावा उनकी ख़्वाहिश करण जौहर, यशराज फिल्म्स, आमिर ख़ान, साजिद नाडियाडवाला और संजय लीला भंसाली के साथ काम करने की भी होती है।मगर सभी की यह तमन्ना पूरी नहीं हो पाती, क्‍योंकि—“हर किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता !”
पर इसका दूसरा पहलू भी है।यदि आपने आपना गोल निर्धारित कर लिया है, यदि आप में पैशन है और यदि आप में जूझने का माद्दा भी है, तो फिर दुष्यंत कुमार जी का ये शेर आपके लिए है—“कौन कहता है कि आसमान में सुराख नहीं हो सकता, एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो।”
सुशांत एक अच्छे अभिनेता थे।वे हिंदुस्तान की फ़िल्म इंडस्ट्री के टॉप टेन सितारों में से एक थे।उन्होंने अपने जीवन में क़रीब एक दर्जन फ़िल्मों में नायक के रूप में अभिनय किया और लगभग सभी उनकी फ़िल्में हिट रहीं।वे फ़िल्मों के मामले में बहुत चूजी थे।हर किसी फ़िल्म को उन्होंने कभी साइन नहीं किया। ऐसा नहीं है कि उनके पास काम नहीं था।अभी उनकी आख़िरी फ़िल्म छिछोरे हिट हुई। उसने 150 करोड़ रुपये का व्यापार किया। शाहरुख़ के ख़ान के बाद सुशांत सिंह राजपूत अकेले ऐसे फ़िल्म स्टार हैं जो टीवी में सफल रहे।एक नया तथ्य है कि वे प्रख्यात फ़िल्म लेखक और निर्देशक रूमी ज़ाफ़री की आगामी फ़िल्म में थे, जिसकी शूटिंग मई के अंतिम सप्ताह में शुरू होना थी। लेकिन कोरोना संकट के कारण लॉकडाउन लंबा चला और फ़िल्म की शूटिंग शुरू नहीं हो पाई। मात्र 10 साल के करियर में सुशांत ने एक बहुत अच्छे अभिनेता का निर्माण किया।वे उन अनेक ऐसे फ़िल्म स्टारों में से एक थे, जो मुंबई के बाहर से आए थे—मतलब वे आउटसाइडर थे और उन्होंने मेहनत और संघर्ष करके इस माया नगरी में अपना महत्वपूर्ण स्थान बनाया था। एक ऐसा स्थान है जहाँ पर हर कोई बहुत आसानी से नहीं पहुँच सकता था।यह झिलमिल सितारों की वह मायापुरी है, जहाँ पर अनेक दिग्गज नेता, अनेक दिग्गज उद्योगपति, अनेक दिग्गज सेलिब्रिटीज़, अनेक दिग्गज व्यापारी, अनेक दिग्गज खिलाड़ियों और अनेक दिग्गज स्टार पुत्रों ने अपनी क़िस्मत आज़माई, उन्होंने बड़ी-बड़ी सिफ़ारिशें लगायी, उन्होंने बड़े-बड़े प्रलोभन दिए, लेकिन वे सफल नहीं हो सके। जहाँ तक चाँदी की चम्मच और उस चम्मच को हाथ में लेकर पैदा होने वालों का सवाल है, तो मैं इस बात को मानता हूँ कि फ़िल्म इंडस्ट्री में ऐसे लोगों की भी क़िस्मत चमकी है और वे स्टार बने हैं।नेपोटिज्म का भी बोलबाला है।पर क्या सभी स्टार पुत्र सफल हो गए ? क्या ये क़ामयाब हो पाए—अभिषेक बच्चन, बॉबी देओल, अभय देओल, इमरान ख़ान, सुहेल ख़ान, अरबाज़ ख़ान, विवेक ओबेरॉय, राजीव कपूर, अक्षय खन्ना, तनीषा मुखर्जी, हरमन बवेजा, ईशा देओल, कुमार गौरव, तुषार कपूर, नील नितिन मुकेश, विवेक मुशरान, उदय चोपड़ा वग़ैरह। इसके अलावा नेताओं, उद्योगपतियों और खिलाड़ियों के भी पुत्र हैं, जो विफल रहे हैं— ये हैं— अंगद बेदी, सचिन जोशी, पुलकित सम्राट, अरुणोदय सिंह और चंद्रचूड सिंह आदि।ऐसे स्टार भी हैं, जो स्टार पुत्र होते हुए स्टार हैं, लेकिन बहुत कम फ़िल्में करते हैं।जिनमें श्रेष्ठ नाम है रणवीर कपूर।शाहरुख़ ख़ान ने तीन साल से कोई फ़िल्म साइन नहीं की।सैफ़ अली ख़ान की फ़िल्में आयी तो हैं, लेकिन कोई सुपर डुपर नहीं हुई।महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. विलासराव देशमुख के पुत्र रितेश देशमुख ने अंततः कॉमेडी का रास्ता चुन लिया।फ़िरोज़ ख़ान के पुत्र फ़रदीन ख़ान बेहद अच्छे कलाकार हैं और उनकी सभी फ़िल्में सफल रही हैं, लेकिन उन्होंने उसके बाद ख़ुद ही फ़िल्मों से हाथ जोड़ लिए।कारण चाहे जो हो।विवेक ओबेरॉय का सलमान ख़ान से पंगा हुआ।अब विवेक के पास फ़िल्में नहीं हैं, किंतु वे डटे हुए हैं।आफ़ताब शिवदासानी बहुत ही अच्छे एक्टर हैं। हंगामा उनकी सफल कॉमेडी फ़िल्म थी।अब काफ़ी समय से उनके पास काम नहीं है, पर वे क़ायम हैं।कुछ अभिनेता साइड रोल करके संतुष्ट हो गए।

मैंने डिप्रेशन और बायपोलर का उल्लेख किया था।डिप्रेशन यानी अवसाद—यह एक रोग या सिंड्रोम है, जो मनोभावों संबंधी दु:खों को प्रकट करता है।एक तरह की निराशा, लाचारी, तनाव, कष्ट, दु:ख, चिंता, भय, अति-भावुकता और मानसिक टूटन—मन की ये परिस्थितियाँ अवसाद हैं, जो आत्महत्या के लिए भी विवश कर सकती हैं। यह बीमारी है और इसका इलाज भी संभव है।दुनिया में इसके 26 करोड़ मरीज़ हैं।देश में यह बीमारी बढ़ती जा रही है।
इसी तरह बायपोलर है।एक तरह से यह डिप्रेशन की ही एक स्टेज है।बायपोलर डिसॉर्डर मानसिक हेल्थ कंडिशन है, जिसमें व्यक्ति का मूड बदलता रहता है और यह स्थिति सामान्य नहीं कही जा सकती।इस डिसॉर्डर से पीड़ित व्यक्ति लंबे वक़्त तक अवसाद की स्थिति में रह सकता है अथवा यह भी संभव है कि वो कि एंग्जाइटी की स्थिति में पहुँच जाए।इस बीमारी के बारे में यह भी कहा गया है कि यह एक साइक्लिक डिसऑर्डर है और इसमें व्यक्ति की मनोदशा दो विभिन्न अवस्थाओं में बारी-बारी से विचरण करती रहती है।
गत छह माह से अवसाद से जूझ रहे सुशांत सिंह राजपूत जैसे एक अच्छे कलाकार की फ़िल्म इंडस्ट्री से हुई इस तरह की एग्ज़िट चौंकाने वाली है।जब हम सुशांत की आत्महत्या जैसे विषय का विश्लेषण करते हैं, तो हमें भावुक होने के बजाय गंभीर होने की आवश्यकता है।हमें पहले तथ्यों को देखना चाहिए।वे कौन-सी परिस्थितियाँ थीं, जिन्होंने सुशांत को आत्मघाती क़दम उठाने के लिए विवश किया था।हमारे यहाँ प्राय: “आत्महत्या के लिए प्रेरित” लिखा जाता है, किंतु मैं “आत्महत्या के लिए विवश” लिख रहा हूँ। हत्या के साथ प्रेरित शब्द उचित है।हत्या के लिए प्रेरित किया—अत: यह वाक्य भी उचित कहा जाएगा।लेकिन किन्हीं घटनाओं और परिस्थितियों के दबाव में अपने-आपको मार देने का निर्णय प्रेरित करना नहीं, विवश करना माना जाएगा।यह विवशता एक तरह की पराजय है।टूटा मन और कमज़ोर क्षण व्यक्ति को ऐसी विवशता की ओर ले जाता है।इसीलिए आत्महत्या को जीवन से पराजित होना माना गया है।यदि यह पराजय नहीं होती तो व्यक्ति के पास आत्महत्या के लिए विवश होने के बजाए अपने-आपको जिलाए रखने का विकल्प था।यदि उस विकल्प को चुना जाता, तो वहाँ से संघर्ष का रास्ता खुलता,  जो विजय की ओर ले जाता है।

कुछ भी हो, फिर भी यह यक्ष प्रश्न हमेशा उपस्थित रहेगा कि आख़िर वह क्या रहस्य है कि एक संपन्न और प्रतिभाशाली अभिनेता सुशांत को अपने हाथों से अपनी ही जान लेनी पड़ी।वह दु:खी तो रहा होगा।कोई तो बात होगी, वरना कोई ऐसे ही अपनी ज़िंदगी से हाथ नहीं धोता। उसके अंतर्मुखी मन में कुछ तो चल रहा होगा।पहले अंकिता लोखंडे, फिर कृति सेनन और अब रिया चक्रवर्ती उसके जीवन में थीं।यानी उस रात को रिया सुशांत का फ़ोन उठा लेतीं, तो क्या उसकी जान बच सकती थी ? क्या वाक़ई ये बड़े प्रोडक्शन हाउस उसे प्रताड़ित कर रहे थे ? क्या उसकी तन्हाई उसकी त्रासदी बनी ? क्या वह बायपोलर का शिकार था ? यह सब जाँच के विषय हैं।
मैं सोचता हूँ कि इस पूरे मामले की तुरंत सीबीआई जाँच होनी चाहिए, ताकि स्पष्ट हो सके कि क्या आत्महत्या के लिए किसी ने विवश किया है ? सुशांत ने अपना स्थान अपनी मेहनत से बनाया था और नई पीढ़ी को यह सबक़ है कि उसे भी मेहनत और संघर्ष से अपना स्थान बनाना चाहिए।रास्ते में बाधाएँ आती हैं, हर कोई मदद भी नहीं करता है, तो उसकी परवाह भी नहीं की जाए।यह सोचना चाहिए कि हम बिना किसी के सहारे आगे बढ़ सकते हैं।चाहे जो हो, किसी भी स्थिति में आत्महत्या के क्षणों को मारना होगा और  इस तरह से अपने-आपको ज़िंदा रखना होगा।