ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

वाक़ई विनम्रता के पर्याय थे मोतीलाल वोरा जी।मप्र में दो बार सीएम रहे, अस्सी के दशक में।अनेक संस्मरण हैं उनके साथ के।एक बड़ा दिलचस्प संस्मरण है।मैं जब नवभारत अखबार में भोपाल में था, तब नवभारत के मालिकों और वोरा जी के बीच मतभेद के कारण संवादहीनता थी और नवभारत में वोरा जी का नाम प्रकाशित नहीं होता था।अर्सा हो गया यह देखते।

एक बार वोरा जी दिल्ली से आए और भोपाल के होटल लेक व्यू अशोक में ठहरे थे।मैंने उनसे बात की और मिलने का समय लिया।इधर मैंने नवभारत के मालिक एवं पूर्व सांसद स्व. प्रफुल्ल माहेश्वरी जी से चर्चा की और उन्हें बताया कि वोरा जी आए हैं और मैं उनसे मिलने जा रहा हूँ।मैं चाहता था कि यह संवादहीनता समाप्त हो, अत: मैंने प्रफुल्ल बाबू से, जिन्हें हम बड़े सा’ब कहते थे, कहा कि क्या आज दोपहर बाद मैं वोरा जी और आपकी मुलाकात आपके बँगले पर करा दूँ।प्रफुल्ल बाबू इस मामले में काफ़ी उदार और मिलनसार थे तथा मतभेद को अधिक समय मन में नहीं रखते थे।वे सहर्ष तैयार हो गए और कहा कि तुम उन्हें हाई-टी पर आग्रहपूर्वक ले आओ।अब मैं वोरा जी से मिलने पहुँचा।उन्हें बताया तो वे अत्यंत सहज  भाव से तैयार हो गए तथा बोले कि जब आप कहेंगे, साथ चलेंगे।दोपहर बाद मैं फिर होटल गया और फिर हम दोनों प्रफुल्ल बाबू के बँगले पहुँचे।दोनों के बीच काफ़ी देर तक आत्मीयतापूर्वक बातचीत होती रही।एक बात और।वोरा जी मूलत: पत्रकार थे और एक ज़माने में नवभारत के संवाददाता थे।वोरा जी की सहजता, सरलता और सादगी की तुलना भाजपा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष कुशाभाऊ ठाकरे और तत्कालीन जनता पार्टी सरकार के पहले मुख्यमंत्री कैलाश जोशी जी से की जा सकती है।