डॉ.राहुल जैन

आज भारत देश विश्व पटल पर एक प्रमुख आर्थिक,राजनीतिक एवं सामाजिक शक्ति के रूप में उदय हो रहा है भारतीय संविधान के अनुसार सभी नागरिकों को समानता का मौलिक अधिकार प्राप्त है आजादी के 70 वर्षों बाद देश के सरकारी एवं निजी क्षेत्रों में सर्वोच्च संवैधानिक एवं गैर संवैधानिक पदों पर अपनी योग्यता और कौशल से  महिलाओं ने  जोरदार उपस्थिति दर्ज कराई है, किंतु यह भी एक कड़वी सच्चाई है कि आज भी समाज में महिलाओं की स्थिति सोचनीय है और महिलाओं के एक बड़े वर्ग को रोजमर्रा के जीवन में मानसिक और शारीरिक उत्पीड़न का सामना करना पड़ता है

परिवार द्वारा प्रताड़ित स्त्री की हिंसा भी अबघरेलू” होती है।कानून ने स्त्री की वेदना को 'घरेलू हिंसाका नाम दिया है। इस घरेलू हिंसा में मार-पीट, अपशब्द और भावनात्मक यातना के साथ यौन हिंसा का कृत्य भी शामिल है।घायल चेहरा,कराहता अन्त: मन, और निराशा से भरा हुआ जीवन, फिर भी बेबसी से जीवन जीने की मजबूरी।अन्तर्मन की वेदना आंसुओं के रूप में सिसकियों के साथ बह निकलती हैं।

राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षणभारत सरकार के आंकड़ें इस सम्बन्ध में चौंकाने वाली रिपोर्ट पेश करते हैं।रिपोर्ट के अनुसार,    भारत में अशिक्षित महिलाओं की तुलना में पढ़ी-लिखी महिलाएं घरेलू हिंसा की शिकार ज्यादा होती हैं एवं घरेलू हिंसा का खतरा कम पढ़ी-लिखी की तुलना में 1.54 गुना तक ज़्यादा होता है।यदि महिला अपने पति से अधिक शिक्षित है तो उसे अलग-अलग यातनाओं के माध्यम से पति की निराशा का सामना करना पड़ता है।जो उसके जीवन को नरक बना देता है।इसके अलावा रिपोर्ट ये भी बताती है कि भारत में करीब 37 प्रतिशत महिलाएं अपने पतियों की वजह से घरेलू हिंसा की शिकार होती हैं। 

नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार 30 अक्टूबर 2019 को वर्ष 2017 के जारी आंकड़ों के अनुसार महिलाओं के खिलाफ अपराध की संख्या लगभग 3,59,849 दर्ज हुई जो कि पिछले वर्ष 2016 सेप्रतिशत अधिक हैएक गैर सरकारी संस्था के अनुसार भारत में लगभग 5 करोड महिलाओं को अपने घर में हिंसा का सामना करना पड़ता है इसमें से मात्र 0.1% महिलाएं हिंसा के खिलाफ पुलिस थाने में रिपोर्ट दर्ज कराती है।इस तरह की हिंसा के 30 से 40 प्रतिशत मामले घर की चार-दीवारी में ही दबे रह जाते हैं।लेकिन यह आवश्यक नहीं कि पुलिस में रिपोर्ट कराने के बाद भी उनको त्वरित न्याय मिलता है।कानून सबूत मांगता है और सबूतों के अभाव में कई बार शोषक कानून की कमी की वजह से आसानी से सजा से बच जाते हैं। ऐसे में महिलाओं को भी भारतीय कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रति जागरुकता होनी चाहिए।

घरेलू हिंसा से उच्च शिक्षित एवं मध्यम वर्गीय समाज की  महिलाएं भी अछूती नहीं हैं। विवाह के बाद,यदि ससुराल पक्ष उदार विचारों वाला एवं सहयोगी प्रवृत्ति का है तब तो विवाहित महिला का आगे का जीवन सुगम हो जाता है,वही विपरीत प्रवृत्ति का होने पर उस महिला का जीवन नरक की पीड़ा को भोगने जैसा होता है।शारीरिक एवं मानसिक पीड़ा जैसे उसके दैनिक जीवन का एक अंग बन जाती है और ज्यादातर,उसके पास सहते हुए विवाह को बरकरार रखने या कोई अनुपयुक्त निर्णय लेने का ही विकल्प होता है। आर्थिक निर्भरता से भी महिलाओं का आत्मविश्वास कमजोर पड़ जाता है इस प्रकार 'घरेलू हिंसा से ग्रसित होने पर महिला स्वयं को असहाय महसूस करती है।

आए- दिन समाचार पत्रों में  समाज के कई प्रभावशाली परिवारों में भी घरेलू हिंसा के प्रकरण सामने आते हैं, लेकिन कई बार वे कानून के लचीलापन का फायदा उठाकर बचने का रास्ता ढूंढने में सफल हो जाते हैं। ऐसे नामचीन परिवारों में भी शोषित महिलाओं से अपेक्षा की जाती है कि वह घर की इज्जत बनाए रखने के लिए अत्याचार सहन कर खामोशी की चादर ओढ़ी रहे और इस तरह करीब 70 फ़ीसदी घरेलू हिंसा के मामले घर की इज्जत के नाम पर कानून की दहलीज पर पहुंचने से पहले ही दम तोड़ देते हैं।हाल ही में मध्यप्रदेश में एक ऐसा प्रकरण सामने आया जिसमें एक उच्च शिक्षित डॉक्टर बहू को भी ससुराल में प्रताड़ना का सामना करना पड़ा और यह प्रकरण अदालत में विचाराधीन  है।

उच्च शिक्षित महिलाएं भी दान दहेज अन्य कारणों से ससुराल की ही महिलाओं द्वारा सताई जाती है ।इसका एक प्रमुख कारण उन महिलाओं का पूर्व में सहा गया पारंपरिक दुराग्रह एवं अतीत की पीड़ा भी है, जो वह नई पीढ़ी में हस्तांतरित कर गौरव का अनुभव करती हैं।परंतु,”क्योंकि सास भी कभी बहू थीके रंग में रंगकर यह भूल जाती हैं,कि अब पीड़ित महिला भी उनके स्वयं के परिवार का एक महत्वपूर्ण अंग है इसीलिए उन्हें तो अपनी बहू को बेटी समझकर व्यवहार करना चाहिए एवं अपने परिवार की संगठन माला को और अधिक मजबूत करना चाहिए ।अपवाद स्वरूप अनेक परिवारों में इस तरह की व्यवस्था भी है।ऐसे परिवार सही मायनों में खुशहाल होते हैं,लेकिन हमारे समाज के कई परिवारों में यह समन्वय एवं सामंजस्य का अभाव दिखाई पड़ता है। आज कई परिवारों की बहूएं छोटे-बड़े सभी कार्यों में सहयोग के साथ-साथ आर्थिक संबल भी प्रदान कर दोहरी भूमिका का सफलतापूर्वक संचालन कर रही हैं।

महिलाओं के लिए कानून से संबंधित जानकारियां:

आज जहां शिक्षा एवं सूचना पूर्व की तुलना में आसानी से उपलब्ध है तथा महिलाएं भी अपने अधिकारों के लिए सजग भी हो रही है,तो फिर प्रश्न उठता है कि क्या वे भारतीय कानून द्वारा दिए गए अधिकारों के प्रति जागरूक है ? जिसमें प्रमुख है- घरेलू हिंसा के खिलाफ अधिकार - यह नियम मुख्य रूप से पुरुष, पति, लिव इन पार्टनर या रिश्तेदारों द्वारा घर की महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करने के लिए बनाया गया है।कानून की जानकारी नहीं होने से अनेक महिलाएं को सालों तक कई जगहों पर शोषण और हिंसा का शिकार होना पड़ता है,ऐसे में हमारे देश की महिलाओं को कुछ जरूरी कानून की जानकारी होनी चाहिए,जो कि उनकी भलाई के लिए ही बनाया गया है।

आईपीसी की धारा 498- दहेज और शोषण संबंधित है इसके अलावा दहेज अधिनियम 1961 की धारा 3 और 4 में केवल दहेज देने या लेने, बल्कि दहेज मांगने के लिए भी दंड का प्रावधान है इसके साथ ही घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण अधिनियम, 2005 भी महिलाओं को उचित स्वास्थ्य देखभाल, कानूनी मदद, परामर्श और आश्रय गृह संबंधित मामलों में मदद करता है

आईटी एक्ट) की धारा 67 और 66- बिना किसी भी व्यक्ति की अनुमति के उसके निजी क्षणों की तस्वीर को खींचने, प्रकाशित या प्रसारित करने को निषेध करती है आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 की धारा 354-सी के तहत किसी महिला की निजी तस्वीर को बिना अनुमति के खींचना या शेयर करना अपराध है

2012 मेंनिर्भयाके साथ हुए क्रूर अपराध के बाद आपराधिक कानून (संशोधन) अधिनियम 2013 में 'ज़ीरो एफआईआर' का प्रावधान किया गया था। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशानुसार कोई भी शिकायतकर्ता/ महिला किसी भी पुलिस स्टेशन पर शिकायत दर्ज करवा सकती है और पुलिस स्टेशन इसके लिए मना नहीं कर सकता।एफआईआर स्थिति में शिकायतकर्ता अपने इलाके के मजिस्ट्रेट के पास पुलिस को निर्देशित करने के लिए शिकायत दायर करवा सकते हैं।

अगर किसी को यह अंदेशा है की किसी महिला के ऊपर घरेलू हिंसा की जा सकती है तो इसकी भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है|इसके अलावा राष्ट्रीय महिला आयोग की वेबसाइट http://ncwapps.nic.in/onlinecomplaintsv2/ पर भी शिकायत दर्ज करवाई जा सकती है|इसके अलावा 1091 पर भी कॉल करके इसकी शिकायत करी जा सकती है|

स्याह पक्ष –

यह बात सच है कि महिला उत्पीड़न और दहेज़ के खिलाफ एक सख्त सज़ा की ज़रूरत है, लेकिन इस कानून का दुरुपयोग रोकने के लिए भी कुछ कदम उठाए जाने चाहिए।कई बार पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ कई झूठी शिकायतें भी मिलती हैं।एक बार पीड़िता के द्वारा केस दायर करने पर ससुराल के रिश्तेदार भी इसकी जद में आकर अदालत के चक्कर काटने पर विवश हो सकते हैं ।कई संगठन इस धारा के दुरुपयोग के खिलाफ लड़ाई लड़ रहे हैं।हमारे आसपास  भी समाज में धारा  498 के दुरुपयोग के कई मामले है। न्यायालय भी सबसे पहले यह जानने का प्रयास करते हैं कि कहीं आरोप मनगढ़ंत तो नहीं है ?

राष्ट्रीय महिला आयोग (दिल्ली हाईकोर्ट) के अधिकृत अधिवक्ता श्री प्रतीक सोम का कहना है कि शोषित महिलाएं अपने कानूनी अधिकारों का उपयोग कर अदालत से न्याय मांगने के लिए स्वतंत्र है,लेकिन यह भी ध्यान रखा जाए कानून का ससुराल पक्ष के खिलाफ दुरुपयोग ना हो |

पुनश्च: -

आज के समय में घरेलू हिंसा के खिलाफ कानून के संबंध में और अधिक जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है |पीड़ित महिला को भी आत्म सजग बनकर भावनात्मक कमजोरी का प्रतिवाद कर आत्मविश्वास एवं आत्मसम्मान के साथ जीवन व्यतीत करने का अधिकार मिलना चाहिए| मेंमहिलाओं के खिलाफ हिंसा से मुक्त भारतबनाना है|

 

डॉ.राहुल जैन (सामाजिक विमर्शकार)