ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

उज्जैन में सम्राट विक्रमादित्य के नाम को अक्षुण्ण बनाए रखने के लिए और उन पर शोध और अनुसंधान का कार्य सतत् जारी रखने के लिए, जो कुछ नाम हम लोग जानते हैं, उसमें एक नाम है—विक्रम विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति और कवि तथा लेखक डॉ. राम राजेश मिश्र। आज विक्रम विश्वविद्यालय में दीक्षांत समारोह हो रहा है। ऐसे अवसर पर यह जानना काफ़ी दिलचस्प होगा और आवश्यक भी होगा कि उज्जैन में दीक्षांत समारोह का इतिहास क्या था और विक्रम विश्वविद्यालय के विकास कार्यों में डॉ. मिश्र का क्या योगदान रहा ? संक्षेप में कहें, तो 1956 में विवि की स्थापना हुई, जिसके लिए 23 हस्तियों ने आंदोलन चलाया। पंचाट बैठी और पं. नेहरू ने फ़ैसला सुनाया कि उज्जैन सांस्कृतिक राजधानी है, इसलिए उसे शिक्षा स्थल बनाया जाना चाहिए। ग्वालियर रियासत के तत्कालीन महाराजा जीवाजी राव सिंधिया ने इसके लिए 300 एकड़ ज़मीन दी और कहा कि वे विश्वविद्यालय के विक्रम नामकरण से भी सहमत हैं। कमल विला के दो कमरों में विश्वविद्यालय प्रारंभ हो गया और पहले प्रशासक बने भाषा, संस्कृति, शिक्षा और साहित्य के विद्वान डॉ. बूलचंद।
डॉ. राम राजेश मिश्र का कुलपति पद का कार्यकाल वर्ष 2004 से 2008 तक है, जिसमें वे दो बार कुलपति रहे। इस दौरान विक्रम विश्वविद्यालय का काफ़ी अच्छा विकास हुआ। उन्होंने अध्ययन, अध्यापन, शोध और विस्तार कार्य पर ज़ोर दिया।विक्रम में 1975 से दीक्षांत समारोह बंद कर दिया गया था, जिसे, डॉ. मिश्र ने 2008 में पुनः प्रारम्भ किया।इसकी विशेषता यह थी कि यह वैदिक परंपराओं के साथ शुरू हुआ था, जैसा कि हमारे तैत्रीय उपनिषद में निर्देश किया गया है।इस नई परंपरा की शुरुआत की स्क्रिप्ट डॉ. मिश्र ने स्वयं तैयार की, जिसका सरकार ने अध्यादेश जारी किया और आज प्रदेश के सभी विश्वविद्यालयों में उसी परंपरा के अनुसार दीक्षांत समारोह आयोजित होता है। 2008 के  इस दीक्षांत समारोह में भारत की पाँच बड़ी हस्तियों को मानद उपाधि से अलंकृत किया गया, जो सभी विक्रम से पढ़े हैं, ये हैं—न्यायमूर्ति श्री जीके लाहोटी, स्वामी अवधेशानंद जी, स्वामी गोकुलोत्सव महाराज, श्री उदय शंकर अवस्थी और श्री आलोक मेहता। उज्जैन शैव परंपरा का स्थान है, इसलिए अवधेशानंद जी का नाम तय किया गया।उज्जैन श्रीकृष्ण भगवान की शिक्षा स्थली है, अतः गोकुलोत्सव जी महाराज का नाम सामने आया। जस्टिस लाहोटी सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रह चुके हैं। श्री अवस्थी कांडला उर्वरक के प्रसार के अग्रदूत हैं और श्री मेहता पत्रकारिता, साहित्य और शिक्षा में अग्रणी हैं।
17 विभागों के विश्वविद्यालय को प्रो. मिश्र ने 27 तक पहुंचाया, जिसमें वैदिक विज्ञान, लोक प्रशासन, माइक्रो-बायोलॉजी, समाज सेवा आदि प्रमुख हैं। इसी प्रकार कॉलेजों की संख्या 70 से 150 तक पहुँचाई। एकाधिक शोध संस्थान एवं अध्ययनशालाएँ स्थापित कीं, जिनमें वैदिक, फ़ार्मेसी और बायोकैमिस्ट्री की अध्ययनशालाएँ प्रमुख हैं।आपके ही कार्यकाल में युवक समारोह में विक्रम भारत के पश्चिम क्षेत्र का सिरमौर बना।इसी प्रकार पूर्व में वेस्ट ज़ोन की यहाँ पर दो खेलों की स्पर्धाएँ होती थीं, जिनमें चार खेल और बढ़ा दिए और इस तरह छह खेलों की स्पर्धाएँ होने लगीं।

विक्रम को पाण्डुलिपि के संग्रह के लिए देश का पाँचवाँ बड़ा रिसोर्स सेंटर बनाया गया है। विश्वविद्यालय के अकादमिक और प्रशासनिक द्वार बनाए गए। महाराज विक्रमादित्य की प्रतिमा स्थापित की गई।पाँच एकड़ क्षेत्र में विक्रम सरोवर का निर्माण किया गया, जिससे पानी की आपूर्ति हो रही है और सिंचाई भी की जा रही है।बड़े आँवले के 11,000 पेड़ लगाए गए, जिससे क्विंटलों में आँवले  की पैदावार हो रही है। इतना ही नहीं पूरे विश्वविद्यालय के चारों तरफ़ दीवार खड़ी की और उस पर मालवा के तीन हज़ार माँडने सजाए गए।यह कार्य शीर्ष चित्रकार प्रो. रामचंद्र भावसार के मार्गदर्शन में संपन्न हुआ।
प्रो. राम राजेश मिश्रा, मेरे बचपन के दोस्त, जिन्हें हम प्यार से बबली कहते हैं, यदि मैं उनके कार्यकाल पर विस्तार से लिखूँ, तो एक पुस्तक छापनी होगी। डॉ. मिश्र को उनके इसी शैक्षणिक नवाचार तथा शिक्षा में गुणवत्ता लाने के लिए यूनेस्को अवार्ड और इंदिरा गांधी अवार्ड से सम्मानित किया गया है। ऐसे वे देश के पहले कुलपति हैं। उन्होंने कॉमनवेल्थ देशों के विश्वविद्यालय संघ के सम्मेलन और संयुक्त राष्ट्र के ऐसे ही एक अन्य सम्मेलन में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। वास्तव में यह हमारे लिए अत्यंत गौरव की बात है।कवि, आलोचक, मप्र के पूर्व संस्कृति सचिव और हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा के पूर्व कुलपति अशोक वाजपेयी ने जब प्रो. राम राजेश द्वारा सँवारे-सजाए और नए सिरे से बनाए गए विक्रम विश्वविद्यालय को ध्यान से देखा, तो कहा—“ कुलपति हो तो ऐसा ! बूढ़े और थके-हारे के बजाय युवा और स्पष्ट एवं नई दृष्टि रखने वालों को ही कुलपति बनाया जाना चाहिए।”