ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

इंदौर में पेयजल के लिए नर्मदा योजना की स्वीकृति के आज 50 वर्ष पूरे हो गए।23 अगस्त 1970 को तत्कालीन मुख्यमंत्री पं. श्यामाचरण शुक्ल ने इंदौर की रेसीडेंसी कोठी पर शाम 6 बजकर 20 मिनट पर नर्मदा योजना की स्वीकृति देने की घोषणा की थी।इसके लिए इंदौर में दो साल तक आंदोलन चला था, जिसमें नईदुनिया, इंदौर की प्रमुख भूमिका थी।नईदुनिया के संपादक अभय छजलानी, कांग्रेस के पूर्व मंत्री चंद्रप्रकाश शेखर, सामाजिक संगठन अभ्यास मंडल के प्रमुख मुकुंद कुलकर्णी सहित पूरा समाज, सभी राजनीतिक दल, विभिन्न वर्गों के लोग, छात्र संगठन, महिलाओं की संस्थाओं, खिलाड़ियों और नागरिकों ने अभूतपूर्व आंदोलन छेड़ा, जो मध्य प्रदेश के इतिहास में जनहित के आंदोलन का एक शानदार उदाहरण है।इसके आठ साल बाद जनता सरकार में, जबकि मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सखलेचा थे, इंदौर को नर्मदा नदी का जल पीने के लिए उपलब्ध हो गया।31 जनवरी 1978 को तत्कालीन विदेश मंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इंदौर में नर्मदा जल योजना का शुभारंभ किया था।
इसके बाद इंदौर में दो और चरणों में नर्मदा का पानी लाया गया।इस प्रकार इंदौर शहर में तीन चरणों में नर्मदा नदी का जल लाया जा चुका है।और अब पिछले दो सालों से इंदौर के नागरिक नर्मदा योजना का चौथा चरण लागू करने की माँग कर रहे हैं।यह माँग जायज़ भी है, क्योंकि इंदौर की जलापूर्ति के लिए नर्मदा के अलावा और कोई भी विकल्प उपस्थित नहीं है।न पहले था और न ही अभी है।न भूतो न भविष्यति !
1970 के पहले, जब इंदौर में नर्मदा जल योजना की माँग चल रही थी, तब नर्मदा के अलावा दो और विकल्प थे—(1) मंदसौर स्थित गांधी सागर बाँध से चंबल का पानी लाना अथवा (2) इंदौर के ही पास स्थित कलारिया बाँध का पानी लाना।लेकिन ये दोनों ही विकल्प इंदौर की प्यास बुझाने के लिए सक्षम नहीं थे।वास्तव में देखा जाए तो इंदौर और भोपाल के लिए नर्मदा जल ही सर्वश्रेष्ठ था और है।लेकिन यह बात कांग्रेस की सरकारों को समझने में बहुत समय लगा।
तत्कालीन मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह तो अंततः यह बात मानने के लिए तैयार ही नहीं थे कि भोपाल के लिए नर्मदा जल प्रदाय योजना श्रेष्ठ है।उनका कहना था कि भोपाल के लिए यह योजना न-केवल अव्यावहारिक है, बल्कि महँगी भी है, परिणामस्वरूप जनता को भी महँगा पेयजल मिलेगा।लेकिन भारतीय जनता पार्टी ने नर्मदा पेयजल योजना को चुनाव का मुद्दा बनाया और भोपाल में नर्मदा जल लाकर इस योजना को व्यावहारिक बनाया।और भोपाल में नर्मदा जल बहुत महँगा भी नहीं है।भोपाल में नर्मदा योजना के अलावा बड़ी झील, केरवा बाँध और कोलार बाँध भी है।इसलिए राजधानी में पेयजल की कोई कमी नहीं रहती।
तत्कालीन मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल ने इंदौर के लिए उपरोक्त फ़ैसला भले ही विलंब से लिया, लेकिन ये श्रेय उन्हीं को जाता है कि वे इंदौर में नर्मदा योजना लेकर आए।इंदौर के नागरिक आज भी इस बात को कहते हैं कि यदि उस ज़माने में नर्मदा योजना इंदौर में नहीं लाई जाती तो आज इंदौर की पेयजल के मामले में बहुत ही बुरी दशा होती।समझ में नहीं आता कि जो बात नागरिक आसानी से समझ सकते हैं, उसे सरकारों को समझने में इतना समय क्यों लगता है ? वह क्यों इतना आंदोलन कराने के लिए लोगों को मजबूर करती है ?