ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

भोपाल। संचार क्रांति के प्रणेता और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के साथ मेरा व्यक्तिगत संस्मरण सिर्फ़ एक है।जिस वर्ष उनकी दु:खद हत्या हुई, उसी वर्ष श्रीपैरम्बदूर जाने के पहले वे भोपाल आए थे। उन दिनों मैं नईदुनिया, भोपाल में था। 1991 की बात है। लोक सभा चुनाव का समय था।भोपाल में रात को इमामी गेट पर राजीव गांधी की चुनावी सभा थी।काफ़ी भीड़ थी।वे बोले भी अच्छा।और कुल मिलाकर सभा सफल रही।सुरक्षा का कोई इंतज़ाम नहीं था मैं मंच के साइड से भाषण कवर कर रहा था।भाषण ख़त्म होने के बाद अफ़रातफ़री मच गई।मुझे राजीव गांधी से मिलना था।सो मैं पीछे से दूसरी साइड से मंच पर चढ़ गया और देखा तो मैंने पाया कि मैं उनके ठीक सामने खड़ा हुआ हूँ।मेरे से पहले मंच पर भोपाल के जाने माने फोटोग्राफर आरसी साहू भी पहुँच गए थे।इसी बीच किसी ने उन्हें उन्हीं का फ़ोटो भेंट किया, जो खून से बनाया गया था।साहू जी ने फ़ोटो खींची।इसी बीच मैंने उन्हें अपना परिचय दिया।कुछ बात की और हाथ मिलाया।वे बहुत प्रसन्न थे, क्योंकि इमामी गेट से लेकर पीर गेट तक चारों तरफ़ भीड़-ही-भीड़ नज़र आ रही थी।तभी राजीव गांधी मंच से नीचे उतर गए।एक स्वप्नदृष्टा नेता का इस तरह से दुनिया से चला जाना बहुत बुरा लगा।

एक प्रसंग और है, विदिशा के सेऊ गाँव का, जब कीचड़ से भी हुआ सामना

इसके पहले 1987 में जब मैं नईदुनिया, भोपाल में था, तब भी उन्हें कवर करने का मौक़ा मिला, लेकिन भारी बारिश और भयावह कीचड़ के कारण उनसे भेंट संभव नहीं हो सकी।बात विदिशा ज़िले के सुदूर गाँव सेऊ की है।वे भोपाल विमान से आए और वहाँ से हेलीकॉप्टर द्वारा विदिशा पहुँचे। वे ग्रामीण विकास का जायज़ा लेने आए थे।पर पानी ने सब चौपट कर दिया।फिर भी वे जीप पर सवार होकर कुछ कार्य देखने के लिए निकले।जीप में सवार हुए—राजीव गांधी, सोनिया गांधी, तत्कालीन मुख्यमंत्री मोतीलाल वोरा, विदिशा के सांसद प्रतापभानु शर्मा और नईदुनिया में मेरे वरिष्ठ साथी रवींद्र शुक्ला जी। मैंने और मेरे साथी राकेश दीक्षित ने समूचे माहौल को कीचड़ में लथपथ होकर कवर किया। अनोखा अनुभव था।