ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

स्व.अरुण जैन को मैं उज्जैन में 1975 के पहले से जानता हूँ, जब स्कूल में था।वे हमारे समाचार छापते थे।अरुण जी ने लंबे समय नईदुनिया, इंदौर के उज्जैन संवाददाता के रूप में कार्य किया। एक ज़माना था जब वे और उनके पिताजी उज्जैन में नईदुनिया के पर्यायवाची थे।
1986 में वे उज्जैन में मेरी शादी के समारोह में नईदुनिया के मालिक महेन्द्र सेठिया जी और इंदौर के पूर्व सांसद ललित जैन जी के साथ आए थे।1992 में हम दोनों ने नईदुनिया के लिए सिंहस्थ का कवरेज किया था।हमारे साथ श्री गणेश साकल्ले और श्री राजीव सोनी भी थे।
लेकिन पूरे दो माह के लिए सिर्फ़ मुझे ही भेजा गया था, क्योंकि मैं उज्जैन का ही बाशिंदा था।अरुण जी के साथ कार्य करते हुए बहुत आनंद आया। कार्य पद्धति को लेकर थोड़ा मतभेद अवश्य हुआ लेकिन श्री महेन्द्र सेठिया ने तत्काल प्रभावी हस्तक्षेप कर प्रकरण समाप्त करवा दिया।
अरुण जी मेरे बहुत अच्छे मित्र थे।उन्होंने कभी भी कुछ भी दिल पर नहीं लिया।वैसे ही उनके पिताजी थे।उनका भी दिल बहुत बड़ा था।पिता-पुत्र के साथ गुज़ारा समय हमेशा याद आएगा और वे दोनों भी हमेशा याद आएंगे।एक ज़माने में दोनो उज्जैन की बड़ी हस्ती थे।
सिंहस्थ के बाद मुझे भोपाल से गुना भेज दिया गया।नईदुनिया, इंदौर के अख़बार मध्यक्षेत्र में संपादक बनाकर।इस पद के लिए नईदुनिया में कई दावेदार थे, लेकिन मेरे हक़ में श्री उमेश त्रिवेदी ने फ़ैसला कराया।हालाँकि मैं जाना नहीं चाहता था, पर मेरे सामने श्रेष्ठ रास्ता भी यही था।फिर उमेश जी मुझे मिलाने इंदौर ले गए।
अभय छजलानी जी मेरे नाम पर ख़ुश थे।उन्होंने मुझसे कहा कि यह तुम्हारी सिंहस्थ की पुण्याई का फल है ! मैं संपादक हो गया।इसी बीच एक घटनाक्रम के दौरान मेरी अरुण जी के पिताजी और स्वतंत्रता सेनानी से अत्यंत क़रीबी रिश्ते क़ायम हो गए, जो उज्जैन से भी घनिष्ठ थे।
मुझसे उम्र में 10 वर्ष बड़े होने के बाद भी अरुण जी से मेरे अत्यंत मैत्रीपूर्ण संबंध थे और वैसे ही अत्यंत आत्मीय संबंध बाबूजी यानी उनके पिताजी अवंतीलाल जैन जी के साथ रहे।

गुना में स्वतंत्रता सेनानियों का तीन दिन का सम्मेलन था और इसमें सम्मिलित होने के लिए आवंतीलाल जी तथा उनकी पत्नी भी आए थे। इस दौरान उनसे पारिवारिक संबंध हो गए।
सिंहस्थ’ 1992 के दिनों में महेंद्र सेठिया जी कभी-कभी शरद पंडित जी को लेकर आते थे और हम लोग साथ रिपोर्टिंग के लिए निकलते थे।अंतिम शाही स्नान के दिन अभय छजलानी जी  सपत्नीक आए, अपनी मित्र मंडली के साथ। तब उज्जैन में आईजी सुरजीत सिंह थे।अभय जी के घनिष्ठ मित्र।अरुण जी, चच्चू (राजीव सोनी) और मैं उस दिन विशेष व्यस्त थे।
एक दिन दत्त अखाड़ा तरफ़ एक नागा साधु के शिविर में शरद पंडित ने कुछ विदेशियों की फ़ोटो खींच ली।इस पर विदेशियों और नागा साधुओं ने आक्रामक होकर शरद पंडित पर एतराज़ की उंगली उठायी और एक तरह से टूट पड़े, अरुण जी ने नागाओं और विदेशियों के समूह का बहादुरी के साथ मुक़ाबला किया और उन्हें चतुराई से शांत भी कर दिया।
लिखने में और परिस्थितियों का मुक़ाबला करने में वे निपुण थे।लेकिन इन परिस्थितियों में उनका इस तरह चला जाना अच्छा नहीं लगा।पुनः उनकी पुण्य स्मृति को नमन !