ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

कैलाश नारायण सारंग के निधन से पूर्ववर्ती जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी के पुरानी पीढ़ी के एक समर्पित नेता की अखरने वाली कमी हो गई है।वे भाजपा के संस्थापक-नेताओं में से एक थे। पार्टी में वीरेंद्र कुमार सखलेचा और हसनात सिद्दीक़ी की कमी तो बनी ही हुई थी।फिर सुंदरलाल पटवा और हाल में कैलाश जोशी तथा बाबूलाल गौर के जाने से यह रिक्तता और बढ़ती ही गई।और अंत में सारंग जी। कैलाश नारायण सारंग भोपाल में भाजपा की पुरानी और कर्मठ पीढ़ी के अंतिम प्रतीक-पुरुष थे। उनके जाने से मानो पुराने पीढ़ी ही चली गई।इस प्रकार वे भाजपा की पितृ परंपरा के प्रमुख और सम्मानीय सदस्य माने जाएँगे।
1982 में जब मैं मुंबई से भोपाल आया, कैलाश नारायण सारंग से तभी से सम्पर्क था।तब पीर गेट चौराहे पर रुई वाले की दुकान के ऊपर भाजपा का पुराना दफ़्तर था।पहली मंजिल पर कार्यालय और दूसरी पर रहने की व्यवस्था।इसी दफ़्तर में सारंग जी बैठते थे।छोटे-छोटे कमरे, जो पुराने ज़माने के थे।
पहले सारंग जी प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री थे, बाद में प्रदेश भाजपा के कोषाध्यक्ष बने। जब वे कोषाध्यक्ष बने, तब पूर्व राज्यसभा सदस्य और लोकसभा के पूर्व सलाहकार रघुनन्दन शर्मा (रघु जी) प्रदेश भाजपा के कार्यालय मंत्री बनाए गए।ये दोनों नेता भाजपा के इस पुराने कार्यालय और नए कार्यालय दोनों में ही नियमित बैठते थे।
रघु जी कहते हैं कि मैंने उनसे संगठन का कार्य सीखा है।सारंग जी पार्टी के निष्ठावान और परिश्रमी कार्यकर्ता-नेता थे।उन्होंने मध्य प्रदेश में पार्टी को खड़ा करने के लिए कुशाभाऊ ठाकरे, प्यारेलाल खंडेलवाल और नारायण प्रसाद गुप्ता (नाना जी) के साथ कंधे-से-कंधा मिलाकर काम किया।उस ज़माने की राजनीति में भाजपा संगठन में इन चार नेताओं का यह कोर-ग्रुप काफ़ी चर्चित और लोकप्रिय था।पर वे कभी मंत्री, विधायक या लोकसभा सदस्य नहीं रहे।सिर्फ़ एक बार राज्यसभा के सदस्य निर्वाचित हुए।लेकिन उनके पुत्र विश्वास सारंग शिवराज सिंह चौहान सरकार में दूसरी बार मंत्री बनाए गए हैं।विश्वास इस बार लगातार तीसरी बार राजधानी भोपाल के नरेला विधानसभा क्षेत्र से चुनकर आए हैं।असल में सारंग जी संगठन के कार्यकर्ता रहे हैं और उन्होंने हमेशा संगठन के कार्यों को ही तरजीह दी है।यही कारण है कि वे सत्ता की दौड़ में कभी नहीं रहे और यही वजह है कि उन्होंने जनसंघ और भाजपा संगठन में काफ़ी कर्मठता के साथ काम किया।
कवि, शायर, पत्रकार और राजनीतिज्ञ सारंग जी विनोद-प्रिय थे और उनके ठहाके प्रसिद्ध थे।चर्चाओं में उनके वक्तव्य और कार्यक्रमों में भाषण उनके विट (प्रत्युत्पन्नमति) से कभी अछूते नहीं रहे।जहाँ भी जाते, ठहाके गूँजने लगते थे।नईदुनिया, भोपाल के तत्कालीन संपादक मदन मोहन जोशी और दैनिक भास्कर के संपादक रहे महेश श्रीवास्तव तथा कैलाश नारायण सारंग—तीनों में यह एक साम्य था।मैं तब नईदुनिया में जोशी जी के साथ सिटी रिपोर्टर के रूप में कार्यरत था।
भोपाल में हिंदुत्व की चेतना जगाने वाले नेताओं में कैलाश सारंग अग्रणी पंक्ति में रहे।सन् 80 के दशक के संभवत: मध्य में उन्होंने कमला पार्क की खुदाई में मिली शिव जी की बड़ी-सी जलधरी के लंबे आंदोलन में मुख्य भूमिका निभाई। वह भोपाल में हिन्दू पुनर्जागरण काल था और पं. ओम मेहता की अध्यक्षता में हिन्दू एकता मंच का गठन हुआ था।आंदोलन करने वालों की माँग थी, यहाँ मंदिर बनाया जाए।
इसी कमला पार्क के बग़ल में एक मंदिर था, जिसमें नागा बाबा का आश्रम था।नागा बाबा भी इस आंदोलन में कूद पड़े।पार्क के एक हिस्से में भोपाल की रानी कमलापति का राष्ट्रीय स्मारक है।प्रशासन ने बड़ी जद्दोजहद करके इस मामले को निपटाया।लेकिन  सारंग जी भोपाल की गंगा-जमुनी संस्कृति के भी पक्षधर थे और इसके लिए उन्होंने काफ़ी काम भी किया।
सारंग जी मासिक पत्रिका नवलोक भारत के संपादक थे।वे कुशल वक्ता थे और उनके भाषण में कविता और शायरी से चार चाँद लग जाते थे। सामाजिक क्षेत्र में भी उन्होंने काफ़ी कार्य किया।वे अखिल भारतीय कायस्थ महासभा के अध्यक्ष भी रह चुके हैं।ऐसे जिंदादिल और ख़ुशमिज़ाज नेता सारंग जी को विनम्र श्रद्धांजलि !