ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

पंकज पाठक

मंत्री बनने के लिए भाजपा में दावेदारों की ऐसी बाढ़ आ गई है कि मंत्रियों की सूची पर अंतिम निर्णय नहीं हो पा रहा है।भाजपा में वरिष्ठों की जंबो सूची है, क्योंकि 50 से अधिक विधायक ऐसे हैं, जो अनेकानेक बार चुनाव जीत चुके हैं।
वहीं दूसरी तरफ़ कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आने वाले ज्योतिरादित्य सिंधिया के पास भी लंबी सूची है। सिंधिया के पास कुल 22 विधायक हैं, जिनमें से दो मंत्री बन चुके हैं।इस प्रकार यदि भाजपा के 50 और सिंधिया के 20 जोड़ दें, तो दावेदारों का यह आंकड़ा 70 पर पहुँच जाएगा।
सिंधिया की रणनीति यह है कि शेष 20 में से कम-से-कम 18 को मंत्री बनवा दिया जाए। क्योंकि सभी 22 विधायकों ने मंत्री बनने के लिए ही सरकार गिरायी है।
इसी उठापटक के बीच—चौथी बार सीएम बने शिवराज सिंह चौहान अपने मंत्रिमंडल के पहले विस्तार की तिथि तय कर ही रहे थे कि कोरोना वायरस ने राजभवन में फैलकर एक नई समस्या पैदा कर दी है।अब यह विचार किया जा रहा है कि शपथ समारोह राज-भवन के बजाय और कहाँ हो सकता है ? इसके लिए एक नाम मिंटो हॉल (पुराना विधानसभा भवन) का भी लिया जा रहा है, क्योंकि वहाँ सोशल डिस्टेंसिंग का पालन बड़ी आसानी से हो सकता है।
मध्य प्रदेश में डिसाइडिंग फैक्टर के रूप में उभरे ज्योतिरादित्य सिंधिया और उनके विधायकों को सत्ता में अधिक-से-अधिक हिस्सेदारी देना भारतीय जनता पार्टी के लिए अब अनिवार्य है।क्योंकि जिन 22 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है, उनमें से अधिकांश ग्वालियर-चम्बल क्षेत्र में हैं।दो सीटें निधन के कारण रिक्त हुई हैं। इस प्रकार कुल 24 विधानसभा क्षेत्रों में उपचुनाव होना है।सरकार बचाने के लिए भाजपा को कम-से-कम 15 सीटों की ज़रूरत पड़ेगी।इसलिए वह चाहती है कि सिंधिया के कम-से-कम 12 से 15 विधायकों को मंत्री बनाया जाए। इसका मतलब हुआ भाजपा के कोटे से कम विघायकों को अवसर मिलेगा।सदन में कुल 230 सीटें हैं और संविधान के अनुसार मंत्री परिषद के सदस्यों की संख्या अधिकतम 35 हो सकती है।लेकिन यह मुख्यमंत्री पर निर्भर करता है कि वे अपनी मंत्रिपरिषद में मंत्रियों की संख्या कितनी रखना चाहते हैं ? आवश्यक नहीं कि सभी 35 पद भरे ही जाएँ।मंत्रिपरिषद में अभी मुख्यमंत्री सहित छह मंत्री हैं।यानी अभी 29 मंत्री और बन सकते हैं।इस हिसाब से यदि सिंधिया के 12 मंत्री बनाए, तो भाजपा के संभवत: आठ-दस से अधिक नहीं होंगे।शेष पद भविष्य के लिए ख़ाली रखे जा सकते हैं।इन आंकड़ों में दो-चार की संख्या आगे-पीछे हो सकती है।
भाजपा के लिए बड़ी समस्या सिंधिया नहीं, ख़ुद भाजपा के विधायक हैं।50 वरिष्ठों में से आठ-दस नाम निकालना कितना मुश्किल है, यह समझा जा सकता है।उधर भाजपा शासन के पिछले 15 सालों में जो मंत्री रहे हैं, वे अब फिर मंत्री बनने के लिए मचल रहे हैं।जैसे राजेंद्र शुक्ल, गौरीशंकर बिसेन और सुरेंद्र पटवा। भाजपा संभवतः यह मापदंड बना रही है कि वरिष्ठों के बजाय नए चेहरों को सामने लाया जाए।यदि यह मापदंड लागू किया गया, तो उपरोक्त तीनों की छुट्टी हो जाएगी।यही कारण है कि ये तीनों प्रदेश भाजपा अध्यक्ष व सांसद विष्णु दत्त शर्मा के पास दु:खड़ा सुनाने गए थे।विन्ध्य क्षेत्र में भाजपा को इस बार भारी सफलता मिली है। उसके 25 से अधिक विधायक जीतकर आए हैं। इसलिए भाजपा संभवतः उक्त नया मापदंड अपनाने पर विवश हो सकती है।
यहाँ उन वरिष्ठ विधायकों की सूची प्रस्तुत है, जो अनेक बार विधानसभा का चुनाव जीते हैं—अरविंद भदौरिया, यशोधरा राजे सिंधिया, गोपीलाल जाटव, भूपेंद्र सिंह, गोपाल भार्गव, प्रदीप लारिया, शैलेंद्र जैन, हरिशंकर खटीक, राजेश कुमार प्रजापति, बृजेन्द्र प्रताप सिंह, जुगल किशोर बागड़ी, नागेंद्र सिंह (नागौद), नारायण त्रिपाठी, रामखिलावन सिंह पटेल, पंचू लाल प्रजापति, नागेंद्र सिंह (गुढ़), केदारनाथ शुक्ला, राम लल्लू वैश्य, कुंवरसिंह टेकाम, जयसिंह मरावी, शिवनारायण सिंह, संजय पाठक, संदीप जायसवाल, अजय विश्नोई, अशोक रोहाणी, गौरीशंकर बिसेन, जालम सिंह पटेल, संजय शाह, डॉ. सीतासरन शर्मा, विजय पाल सिंह, ठाकुरदास नागवंशी, सुरेंद्र पटवा, रामपाल सिंह, विश्वास सारंग, करण सिंह वर्मा, सुदेश राय, गायत्री राजे पवार, कुंवर विजय शाह, रमेश मेंदोला, मालिनी गौड़, महेंद्र हार्डिया, उषा ठाकुर, पारस जैन, डॉ. मोहन यादव, चेतन काश्यप, राजेन्द्र पांडे, यशपाल सिंह सिसोदिया, जगदीश देवड़ा, ओम प्रकाश सखलेचा और नीना वर्मा आदि।सिंधिया समर्थकों के नाम— गोविंद सिंह राजपूत, तुलसी राम सिलावट, डॉ. प्रभु राम चौधरी, प्रद्युम्न सिंह तोमर, इमरती देवी, महेंद्र सिंह सिसोदिया, हरदीप सिंह डंग, ऐदल सिंह कंसाना, रघुराज सिंह कंसाना, राज्यवर्धन सिंह दत्तीगाँव, कमलेश जाटव, रक्षा सरौनिया, जजपाल सिंह जज्जी, सुरेश धाकड़, ओपीएस भदौरिया, रणवीर जाटव, गिरीराज दंडौतिया, जसवंत जाटव, मुन्ना लाल गोयल, ब्रजेंद्र यादव,मनोज चौधरी और बिसाहू लाल सिंह।इनमें से राजपूत और सिलावट मंत्री बन चुके हैं।इसी प्रकार से भाजपा के कोटे से डॉ. नरोत्तम मिश्रा, कमल पटेल और मीना सिंह मंत्री बने है।
भाजपा के उपरोक्त दावेदारों में रामखिलावन एकमात्र कुर्मी और अशोक रोहाणी एकमात्र सिंधी विधायक हैं।इसी प्रकार से जालम सिंह अकेले लोधी हैं।देखना है चक्रव्यूह में फँसे शिवराज इस बार क्या तरकीब लगाते हैं, क्योंकि उन्हें इस पारी में फ़्रीहैंड नहीं मिला है।मंत्रिपरिषद के गठन में यह साफ़ दिखाई देता है।वे गोपाल भार्गव को मंत्री बनाना चाहते थे लेकिन अमित शाह ने डॉ. नरोत्तम मिश्रा का नाम फ़ाइनल किया।इसी प्रकार शिवराज कमल पटेल के पक्ष में भी नहीं थे, क्योंकि वे उनके पुराने विरोधी हैं।लेकिन कैलाश विजयवर्गीय समर्थक कमल के लिए राजनाथ सिंह का फ़ोन आया था।