ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

संभवत: कम ही लोग जानते होंगे कि हिन्दी पत्रकारिता के युग पुरुष प्रभाष जोशी ने सन् 60 के दशक के प्रारंभ में इंदौर में विनोबा भावे के साथ भूदान यज्ञ में भाग लिया था।सर्वोदयी-गांधीवादी एवं हिंदी और अंग्रेज़ी के पत्रकार और लेखक प्रभाष जी की परसों पाँच नवंबर को 84 वीं जयंती थी। उनकी विनम्र स्मृति में श्रद्धासुमन ! प्रभाष जी के अनुज गोपाल जोशी मेरे मित्र हैं और ‘नवभारत’ में काफी समय मेरे साथ रहे।
विनोबा जी जब इंदौर आए, तब प्रभाष जोशी नईदुनिया, इंदौर के संपादकीय विभाग में कार्य कर रहे थे, जहाँ उन्होंने डेस्कवर्क भी किया और रिपोर्टिग भी।तब बाबा, मतलब राहुल बारपुते नईदुनिया, इंदौर के संपादक थे। वे 11 फरवरी 1954 को नईदुन‍िया के प्रधान संपादक नियुक्‍त किए गए थे। 25 जुलाई 1960 को विनोबा जी इंदौर आए और एक माह, यानी 24 अगस्त 1960 तक रहे।विनोबा जी भूदान की पदयात्रा पर निकले थे और पूरे देश का भ्रमण कर रहे थे। भूदान मतलब भूमिहीनों को खेती के लिए भूमि उपलब्ध कराने का आंदोलन।
भूदान यात्रा के दौरान ही वे इंदौर पहुंचे थे।इंदौर से उन्हें बहुत लगाव था, क्योंकि वह कहते थे कि यह अहिल्याबाई की नगरी है, इसलिए एक जागृत शहर है, अतः इसे स्वच्छ होना ही चाहिए। इंदौर क्षेत्र की भूदान यज्ञ यात्रा के दौरान विनोबा जी का तत्कालीन हालमुकाम इंदौर शहर रहा। वे इंदौर में रीगल तिराहे पर स्थित तत्कालीन सफेद कोठी में रहे, जो आज सेंट्रल लाइब्रेरी कहलाती है।आज भी इंदौर में विनोबा जी की स्मृति में विसर्जन आश्रम और कुटिया है।
बहरहाल प्रभाष जी ने विनोबा की भूदान पदयात्रा का नईदुनिया के लिए जोरदार कवरेज किया, जो अखबार में प्रमुखता से प्रकाशित हुआ। इसी के साथ वे विनोबा भावे से भी जुड़ गए।
सन् 1965 के आसपास प्रभाष जोशी भोपाल आ गए और यहाँ लगभग उसी समय 'मध्यदेश' का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। वे मध्यदेश में आ गए, यहां पर शरद जोशी पहले से ही थे। 1972 में वे जयप्रकाश नारायण के मुँगावली के दस्यु-आत्मसमर्पण अभियान से जुड़ गए।
अंततः वे दिल्ली पहुँचे और इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप के साथ जुड़े। यहाँ सबसे पहले उन्होंने हिंदी साप्ताहिक 'प्रजानीति' प्रारंभ किया। लेकिन आपातकाल में इसे बंद करवा दिया गया, तब उन्होंने इसी ग्रुप के हिंदी मासिक 'आसपास' की शुरुआत की। वह इन दोनों के संपादक रहे। इस प्रकार प्रभाष जोशी को इंडियन एक्सप्रेस जैसे अंग्रेज़ी-दाँ ग्रुप में हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं की शुरुआत कराने का श्रेय है।
पर इस अँगरेजी-दाँ ग्रुप के हिंदी-प्रेम का शीघ्र ही समापन हो गया।क्योंकि इसके बाद प्रभाष जी अंग्रेजी पत्रकारिता से जुड़े और इंडियन एक्सप्रेस के कई संस्करणों के संपादक रहे। यह संभवत: 70 के दशक के लगभग अंत की बात है।थोड़े दिन बाद इस ग्रुप का हिन्दी-प्रेम पुन: जागृत हो गया। ग्रुप ने बंबई में में फिर हिंदी की एक पहल की और 1980 में ‘हिंदी एक्सप्रेस’ नाम से साप्ताहिक पत्रिका प्रारंभ की, जो किसी भी भाषा की अब तक की सबसे कम मूल्य—एक रुपये की थी।शरद जोशी इसके संपादक बने।बम्बई में तब मैं उनके साथ था।लेकिन दुर्भाग्यवश इंडियन एक्सप्रेस समूह का हिंदी का बुखार एक साल में फिर उतर गया।ग्रुप ने ‘हिन्दी एक्सप्रेस’ को बंद कर दिया। मगर प्रभाष जोशी 1983 में इंडियन एक्सप्रेस ग्रुप में फिर से हिंदी की वापसी कराने में सफल हो गए—‘जनसत्ता’ के प्रकाशन के साथ, जो अभी भी मौजूद है।
प्रभाष जोशी के लेखन का राजनीतिक विश्लेषण के अलावा क्रिकेट भी प्रिय विषय था। हिंदी में प्रभाष जोशी इस दृष्टि से विलक्षण पत्रकार थे, क्योंकि उन्होंने न-केवल हिंदी, बल्कि अंग्रेजी पत्रकारिता में भी अपना विशेष स्थान स्थापित किया। उनके समकालीन राजेंद्र माथुर अंग्रेजी साहित्य के प्रोफ़ेसर थे, लेकिन उन्होंने पत्रकारिता पूरे समय हिंदी की ही की।
हिंदी पत्रकारिता में एक ऐसा समय आया, जब राजेन्द्र माथुर और प्रभाष जोशी क्रमशः नवभारत टाइम्स और जनसत्ता के संपादक थे। दोनों नईदुनिया के।दोनों इंदौर के।ये दोनों ही मालवी-मानुस ! दोनों ही देश के हिंदी के शीर्ष अख़बारों के संपादक। दोनों ही राम बहादुर राय को पसंद करते थे।देश के ये दोनों दिग्गज संपादक चाहते थे कि राम बहादुर जी उनकी अख़बार में आ जाएँ।आखिरकार राम बहादुर जी एक बार नवभारत टाइम्स में चले गए और एक बार
जनसत्ता में !
वास्तव में मदन मोहन जोशी और प्रभाष जोशी दोनों करीबी—समकालीन थे। मतलब दोनों का ही जन्म 1936 में हुआ, जबकि राजेंद्र माथुर का जन्म 1935 में। वहीं शरद जोशी 1931 में पैदा हुए।
ये सभी नईदुनिया की परंपरा के पत्रकार थे। हालांकि शरद जोशी बाद में व्यंग्य लेखन में चले गए, फिर भी बीच-बीच में उनकी पत्रकारिता जारी रही। नईदुनिया की पत्रकारिता की परंपरा के पितामह राहुल बारपुते थे और उनका जन्म 1922 का है। चारों ही राहुल जी के साथ आत्मीयता के साथ हमेशा जुड़े रहे।
प्रभाष जोशी द्वारा एक्सप्रेस ग्रुप में जनसत्ता के माध्यम से हिंदी की वापसी कराना हिंदी पत्रकारिता की एक विशेष घटना मानी जाएगी। साथ ही जब भी हिंदी पत्रकारिता में भाषा की बात होगी, राहुल बारपुते, राजेंद्र माथुर और प्रभाष जोशी का नाम प्रमुखता के साथ लिया जाएगा और भाषा में तथा फीचर लेखन में नवाचार करने के लिए मदन मोहन जोशी याद किए जाएँगे।
प्रभाष जी और जनसत्ता एक-दूसरे के पर्यायवाची शब्द बन चुके हैं।जहाँ नईदुनिया के संपादकों ने आम बोलचाल की भाषा को नईदुनिया की भाषा बनाया, अखबारों की भाषा बनाया, वहीं प्रभाष जोशी ने जनसत्ता में इस प्रयोग को और आगे बढ़ाते हुए जनसत्ता की भाषा में देशज शब्दों का इस्तेमाल प्रारंभ किया। प्रभाष जी ने जनसत्ता के समाचारों के  शीर्षकों को बेहद दिलचस्प और समग्र बनाने का सफल प्रयत्न किया। हिंदी के पाठकों ने जनसत्ता का भी स्वागत किया। लेकिन एक यह अच्छी बात थी कि जनसत्ता एक स्थान पर केंद्रित नहीं हुआ और उसने देश में हिंदी के लिए एक अच्छी पहल करते हुए इस अखबार के अनेक संस्करण शुरू किए।इस प्रकार इंडियन एक्सप्रेस समूह ने अंतत: हिंदी पत्रकारिता को आगे बढ़ाने के लिए ठोस पहल की।हालाँकि यह प्रयोग बहुत अधिक सफल नहीं हो पाया, फिर भी हिंदी पत्रकारिता के विकास में जनसत्ता के बहु-संस्करण प्रकाशित करने की प्रभाष जोशी की योजना का बहुत महत्व और सम्मान है।
राष्ट्रीय पत्रकारिता में भी जनसत्ता का महत्वपूर्ण स्थान है और 37 वर्षों से वह मुसलसल प्रकाशित हो रहा है।
जनसत्ता के दिलचस्प शीर्षक का एक घटनाक्रम मेरे साथ भी जुड़ा है। संभवतः 1983 की ही बात है। मैं श्रीराम तिवारी जी के साथ मध्य प्रदेश सरकार के संस्कृति विभाग की संस्था मध्य प्रदेश कला परिषद में कार्यरत था। वे कला मासिक 'कलावार्ता' के संपादक थे और मुझे कला परिषद में लेकर आए थे तथा मुझे इस कला पत्रिका का  सहायक संपादक बनाया था।
संभवत: उसी वर्ष संस्कृति विभाग ने भारत भवन में महिलाओं पर केंद्रित सात दिवसीय एक आयोजन किया, जिसमें साहित्य, नृत्य, संगीत और कला के क्षेत्र में कार्य करने वाली महिलाओं के कार्यक्रम प्रस्तुत किए गए थे। तिवारी जी ने मुझसे इसकी एक रिपोर्ट तैयार कराई और संस्कृति विभाग तथा तिवारी जी की योजना के अनुसार वह जनसत्ता में पूरे पृष्ठ पर प्रकाशित हुई। जनसत्ता ने इसका जो शीर्षक दिया, वह है--"गाती, बजाती, नाचती महिलाएँ !" उस ज़माने में पत्रकारिता में इस प्रकार के प्रयोग काफ़ी चर्चित रहते थे।
कलावार्ता के बाद ही मेरी दैनिक समाचार पत्र की पत्रकारिता का नईदुनिया-युग प्रारंभ हो गया था।मतलब 1984 से।