ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

भोपाल।उज्जैन के माधव कालेज के कार्यक्रमों में सक्रिय रहने वाले और उज्जैन उत्तर से जीतनेवाले मप्र के पूर्व मुख्यमंत्री प्रकाशचंद्र सेठी वास्तव में जीवट नेता थे।नौकरशाही से कसकर काम कराने वालों में हमेशा उनका नाम मशहूर रहेगा।आज उनकी 26 वीं पुण्यतिथि है।1999 में उनकी जन्म शताब्दी थी।जिस पर प्रदेश कांग्रेस कमेटी ने कोई ख़ास महत्व नहीं किया।कुछ नेताओं ने रस्मी तौर पर उनकी तस्वीर को माला पहनाकर अपनी फ़ोटो खिंचवा ली, बस !
श्यामाचरण की विदाई के बाद 1972 में उन्हें मुख्यमंत्री बनाया गया।उनके नाम का चयन करने के लिए विधायक दल की बैठक कांग्रेस के इतिहास में पहली बार प्रधानमंत्री निवास पर हुई थी।इसलिए कहा जाता है कि वे इकलौते मुख्यमंत्री हैं, जिनका जन्म प्रधानमंत्री के निवास पर हुआ।प्रख्यात पत्रकार मदनमोहन जोशी ने अपनी एक पुस्तक में प्रकाशित एक लेख में तो यहाँ तक लिखा कि पहला मौक़ा है, जब नेता चयन के लिए प्रधानमंत्री निवास सत्ता के प्रसूति गृह में तब्दील हुआ हो।
वे विधानसभा चुनाव जिताने के लिए लाए गए थे, उसमें सफल भी हुए, आपातकाल का प्रारंभिक काल उन्होंने “अच्छे से” निकाला, लेकिन आपातकाल लगने के छह माह बाद इंदिरा गांधी ने उन्हें केंद्र में बुला लिया।
पं. द्वारिका प्रसाद मिश्र, पं. श्यामाचरण शुक्ल और वीरेंद्र कुमार सकलेचा की तरह वे कब-किससे भिड़ जाएँगे, कहा नहीं जा सकता।वे दो बार मप्र के मुख्यमंत्री रहे, लेकिन एक भी कार्यकाल पूरा नहीं किया।ये वो ज़माना था, जब अनेक मुख्यमंत्रियों को ज़्यादा दिन टिकने ही नहीं दिया जाता था।और शुक्ल-बंधुओं से उनका छत्तीस का आँकड़ा था।आजकल के सीएम तो पट्टा लिखवाकर जमे हुए हैं।सेठी 1972 से 1975 के बीच दो बार सीएम रहे।उनके केंद्र में जाने के बाद श्यामाचरण फिर लौट आए और आपातकाल के दौरान पूरा राज किया।
सेठी केंद्रीय मंत्रिमंडल में 1962 से थे।पूरे दशक वे उपमंत्री से लेकर केबिनेट मंत्री तक रहे।फिर लंबे समय इंदिरा जी के साथ केंद्रीय मंत्रिमंडल में में उनकी मौजूदगी बनी रही।
इंदिरा जी की मृत्यु के बाद दुर्भाग्य का ऐसा सिलसिला चला कि वह उनके अंतिम समय तक बना रहा।अंततः आर्थिक अभावों में उनकी मृत्यु हो गई।वे प्रकाशचंद्र सेठी, जिन्होंने पार्टी को आश्चर्यजनक रूप से भरपूर चंदा दिलाया था, उन्होंने ऐसी विषमता में अंतिम साँस ली।
कहना होगा कि वे ईमानदार और कुशल प्रशासक थे।लेकिन कांग्रेस के बाद के कुछ मुख्यमंत्रियों ने उनसे कुछ सीखा नहीं।इंदौर और उज्जैन उनके चुनाव क्षेत्र थे।एक नकारात्मक टिप्पणी उनके खाते में दर्ज होगी कि इन क्षेत्रों का कोई ख़ास विकास नहीं हो पाया।