ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

अब वह समय आ गया है, जब प्रेस की आज़ादी पर सवाल उठाया जाना चाहिए।सवाल यह उठना चाहिए कि इन्हें कितनी आज़ादी दी जाए ? सवाल यह उठना चाहिए कि क्या इन्हें अपना दिन भर का एजेंडा तय करने की छूट है ? क्या ये दिनभर की गपड़चौथ के लिए विषय निर्धारित कर सकते हैं ? इस पर राष्ट्रीय बहस होनी चाहिए कि इन्हें प्रेस के नाम पर आज़ादी कुछ ज़्यादा ही नहीं मिली हुई है ? 
इन्हें मिलने वाले विज्ञापनों की फाइलों को सार्वजनिक किया जाना चाहिए।इनसे एडवरटोरियल के माल का हिसाब भी माँगा जाए।पैड न्यूज पर नज़र रखने के लिए हर अख़बार और चैनल के ऑफ़िस में सरकार की विभिन्न जाँच एजेंसियों के प्रतिनिधियों की नियमित नियुक्ति की जाए।प्राइम टाइम की डिबेट को ग़ैरक़ानूनी घोषित कर, इस पर प्रभावी रोक लगायी जाए।और यदि बहस आवश्यक है, तो भी वह प्राइम टाइम में नहीं की जा सकती।इसके लिए केंद्रीय सूचना और प्रसारण मंत्रालय की विशेष अनुमति से समय निर्धारित होगा, तब डिबेट की जा सकेगी।लेकिन इसमें पानी के गिलास और चाय के कप नहीं रखे जाएँगे, क्योंकि इनसे हिंसा भड़क सकती है और इनका इस्तेमाल घातक हथियारों के रूप में किया जा सकता है।चूंकि पूर्व में ऐसा हो चुका है, इसलिए यह सावधानी आवश्यक है। पर इस अनुमति के लिए एक निश्चित धन राशि जमा करनी होगी।इस योजना का लाभ उठाकर वे कई दिनों तक सेलिब्रिटी पर न्यूज़ स्टोरी भी चला सकते हैं—वो भी 24 घंटे।
इसमें एक शानदार स्कीम भी है, जो मीडिया को बहुत पसंद आएगी।वह यह कि यदि मीडिया डिबेट में पानी का गिलास और चाय का कप रखना चाहती ही है, तो उसके लिए उसे 3 गुना शुल्क देना होगा।हाँ, यदि गिलास और कप रखने से हिंसा भड़कती है और डिबेट में मारधाड़ शुरू होने की स्थिति में न्यूज चैनल की टीआरपी बढ़ जाती है, तो चैनल को सरकार से मिलने वाले विज्ञापन की राशि में से 30 % राशि प्रधानमंत्री सहायता निधि के लिए काट ली जाएगी।व्यापक जनहित को देखते हुए अब ये क़दम उठाए जाना आवश्यक हो गया है।
अब वह समय आ चुका है, जब मीडिया को कसने की ज़रूरत है।जितने आज़ादी इन्हें मिली हुई है, उतनी तो मोदीजी और अमित भाई को भी नहीं मिली है।यहाँ तक कि सोशल मीडिया को भी नहीं।इसलिए कुछ करना पड़ेगा।
यह सब इसलिए कहा जा रहा है—क्योंकि आज सबसे बड़ा संकट राष्ट्र के सामने न तो नक्सलवाद है, न आतंकवाद है, न तुष्टिकरण है, न छद्म धर्मनिरपेक्षता है, न सांप्रदायिकता है, न जातिवाद है, न धार्मिक पाखंड है, न क्षेत्रीयतावाद है, न भाषा का विवाद है, न भ्रष्टाचार है, न लव जेहाद है, न बेरोज़गारी है, न धार्मिक कट्टरता है, न लचर अर्थव्यवस्था है, न कोविड-19 का कोई विशेष संकट है।
सबसे बड़ी समस्या है, ख़तरा है, संकट है— मीडिया !!! यह बेक़ाबू हो रहा है।इसमें नकेल लगानी ही पड़ेगी।
आज राजीव गांधी का मानहानि विधेयक प्रासंगिक हो गया है।कुछ उत्साहीलालों का तो यहाँ तक कहना है कि यदि मीडिया के लिए सीमित आपातकाल और प्रेस सेंसरशिप लागू कर दी जाए, तो मीडिया को नियंत्रित करने में काफ़ी हद तक सफलता मिलेगी। जनता पर भी अच्छा असर पड़ेगा, क्योंकि लोग सरकार और विपक्ष से नहीं, मीडिया से ज़्यादा त्रस्त हैं। उनका मत है कि सारे झगड़े की जड़ मीडिया ही है।
अतः केंद्र सरकार राजनीतिक राग-द्वेष को भुलाकर इस मानहानि विधेयक को लोकसभा में पेश करे।यह ऐसा विधेयक है, जो राज्यसभा में भी मज़े से पारित हो जाएगा, क्योंकि कभी विरोध करने वाली भाजपा आज स्वयं सरकार में है और वह ख़ुद विधेयक ला रही है।
हो सकता है सरकार के इस भावनात्मक क़दम से द्रवित होकर पूरी कांग्रेसी ही मोदी सरकार में शामिल हो जाए।टंटा भी ख़त्म। कांग्रेस-मुक्त भारत का ख़तरा भी समाप्त हो जाएगा और कांग्रेस-युक्त भाजपा-युग प्रारंभ होगा। सभी राज्यों में साढ़े छह साल से यही हो रहा है।और सबसे अच्छी बात यह है कि कांग्रेस भी इसे पसंद कर रही है। बड़े उत्साह का माहौल है।उमंग से भरे हुए भावुक कांग्रेसियों का कहना है कि इससे अच्छी और क्या बात हो सकती है कि हम कांग्रेस सरकार में भी मंत्री थे और भाजपा में शामिल होकर भी मंत्री बन रहे हैं। इन फूल छाप कांग्रेसियों ने रुँधे गले से कहा कि—‘भारतीय प्रजातंत्र के आदर्श की यह पराकाष्ठा नहीं तो और क्या है !’
लेकिन इससे भी अधिक बुद्धिमान और कभी भी वोट नहीं डालने और नि:शुल्क ज्ञान बाँटने वाले अति-बुद्धिजीवियों का अभिमत है कि—‘अब हम नोटा को प्रोत्साहित कर रहे हैं।मतलब या तो पोलिंग बूथ पर जाओ ही मत और ईवीएम का बटन दबाओ ही मत और अगर चले भी गए हो, तो बस, नोटा का बटन दबा कर चले आओ ! भले ही सभी हार जाएँ पर हम किसी को भी जीतने नहीं देंगे !’