ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

भारतीय पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर अब एक ऐसा नाम हो गया है, जिनके नाम के पहले कोई बड़ा विशेषण लगाने की आवश्यकता नहीं है।इतने सुपरिचित और इतने सुविख्यात पत्रकार।संपादक।वक्ता और लेखक।
उनके क़रीबी उन्हें रज्जू बाबू कहा करते थे।हिन्दी ही नहीं, समूची भारतीय पत्रकारिता में राजेन्द्र माथुर के बारे में आज भी प्राय: यह कहा जाता है कि वे बहुत जल्दी चले गए।सिर्फ 56 साल की उम्र में ! आज उनकी 30 वीं पुण्यतिथि है। उनकी स्मृति में नत-मस्तक।
बात इंदौर की है और दशक 50 का। शरद जोशी उनके क़रीबी दोस्त थे।माथुर साहब और शरद जी की आयु कोई बीस-बाइस बरस रही होगी।शरद जी का नईदुनिया में आना-जाना था।वे नईदुनिया में लिखने लगे थे।और बाबा, माने राहुल बारपुते जी नईदुनिया के संपादक बन चुके थे।
एक दिन शरद जी माथुर साहब को राहुल जी से मिलाने के लिए नईदुनिया कार्यालय लेकर आए।इस ऐतिहासिक मुलाक़ात के ये तीन ही चश्मदीद गवाह थे और दुर्भाग्य से अब ये तीनों ही नहीं हैं। इस मुलाक़ात के बाद माथुर का नईदुनिया में लेखन प्रारम्भ हुआ।उनके लेखन से राहुल जी बहुत ख़ुश थे और वे उन्हें बेहद पसंद करने लगे। बाबा प्रधान संपादक थे।और एक दिन माथुर साहब गुजराती कॉलेज की अंग्रेज़ी की प्राध्यापकी छोड़कर नईदुनिया के संपादक हो गए।और यह बात वर्ष 1970 की है।
इस प्रकार पचास-साठ और सत्तर के दशक अहम हैं। इस दौरान रज्जू बाबू का नईदुनिया से परिचय हुआ। वे उसमें लिखने लगे। फिर वे नईदुनिया में शामिल हो गए। फिर नईदुनिया के संपादक बनाए गए।और इस तरह से वे इन तीन दशकों में अपने धुँआधार लेखन से समूची पीड़ी को प्रभावित करते रहे।और इसी बीच उनकी देशव्यापी ख्याति हो गयी।
फिर एक मित्र के कारण वे टाइम्स ग्रुप के संपर्क में आए।1982 में आप नवभारत टाइम्स, नई दिल्ली के प्रधान संपादक नियुक्त किए गए।अब वे देश में भारतीय पत्रकारिता के शीर्ष पर थे।नभाटा में वे 1991 तक रहे।इसी वर्ष उनका अवसान हुआ।
राजेन्द्र माथुर का पत्रकारिता का यह स्थान आज तक कोई नहीं ले पाया।वह भाषा, शैली, शिल्प, बिम्ब, प्रतीक, मुहावरे, लोकोक्तियाँ और क्षेपक किसी के पास नहीं है।यह कमी आगे भी स्वीकार करनी होगी।