ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

देश और ख़ासकर हमारे मध्य प्रदेश के शीर्ष रंगकर्मी सतीश मेहता जी का एकाएक अवसान एक गहरी सांस्कृतिक क्षति है।भोपाल में सतीश मेहता जी के साथ बरसों सत्संग (मतलब जलपान पर भेंट) हुआ।फिर उनके अनुज और मध्य प्रदेश कांग्रेस सेवादल के पूर्व मुख्य संगठक एवं मेरे लगते-जिगर स्व. सुबोध मेहता से सत्संग होने लगा।एक समय तो मैं, सुबोध भाई तथा प्रदेश के एक दबंग दलित नेता डॉ. इंद्रेश गजभिए—हम लोगों की तिकड़ी थी।सतीश जी यह जानते थे और मुस्कराते थे।
उनके कुछ नाटक मैंने देखे हैं।जिन्हें देखकर लगता था कि वे उन कुछ रंगकर्मियों में से कहे जाएँगे, जो टोटल थियेटर करते हैं।वे मितभाषी, गंभीर, अनुभवी, मँजे हुए, शिष्ट एवं संस्कारित रंग-कलाकार थे।किसी से भी जब वे आत्मीयता के साथ दो-चार होते थे, तो लगता था, मानो प्रेम का सागर ही बह रहा है।

मध्य-प्रदेश में भाजपा शासनकाल के प्रारंभिक दिनों में उन्हें मध्य प्रदेश रंगमंडल, भारत भवन का निदेशक बनाया गया था।यह दायित्व उनके काम और उनके कृतित्व की गरिमा के सर्वथा अनुकूल था।इस पद पर रहते हुए उन्होंने थियेटर की एक पीढ़ी के निर्माण में सार्थक कार्य किया।उन्होंने—प्रयोग—का गठन किया और इसके बैनर तले पूरे प्रदेश में धूम मचा दी।इसकी धमक मध्य प्रदेश के बाहर भी हुई।
उन्होंने जीवन भर कॉलेज की प्रोफ़ेसरी की और इसी के समानांतर वे जीवन भर रंगकर्म करते रहे।इस दृष्टि से वे जीवट कलाकार थे। उनके सुदीर्घ रंग-जीवन पर शोध की आवश्यकता है।पता नहीं, पहले और आज थियेटर में शोध पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता ? जबकि मप्र के संस्कृति जगत में, लोक और आदिवासी कलाओं तथा उनकी बोली एवं समग्र संस्कृति पर काफ़ी कार्य हुआ है।संभवत: इसीलिए डॉ.कपिल तिवारी को पद्मश्री से भी विभूषित किया गया है।जगदीश स्वामीनाथन जी ने तो जंगलों, पहाड़ों और खदानों तक में कलाकारों को खोजा और भारत भवन लाकर विश्व कला जगत में स्थापित कर दिया।
ब. व. कारंत जी का मध्य प्रदेश से जाना हमारे प्रदेश के लिए एक बहुत बड़ी सांस्कृतिक क्षति थी।यदि वे होते, तो रंगमंडल, भारत भवन में और अच्छा कार्य करते।आशा की जानी चाहिए कि मध्य प्रदेश का संस्कृति विभाग इस दिशा में सोचेगा और सतीश मेहता जी के थियेटर में योगदान को स्मरणीय बनाने के लिए कुछ ठोस पहल करेगा।
रंगजगत में मालवा के इस अनूठे कलाकार का नाम हमेशा आदर के साथ लिया जाएगा।मेरी सादर श्रद्धांजलि।🙏🌹