11 मार्च को इस वर्ष की महाशिवरात्रि पड़ रही है। भोलेनाथ को समर्पित ये त्यौहार भारत में बहुत धूम-धाम से मनाया जाता है। कहा जाता है कि इस दिन भगवान शिव और देवी पार्वती का विवाह संपन्न हुआ था। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार जब भगवान शिव देवी पार्वती को वरने आए थे उनके लिबास देखकर देवी पार्वती की मां तक देखकर बेहोश हो गई थी। कैलाश पर रहने वाले शिव शंकर का पहनावा हिंदू धर्म के तमाम देवी-देवताओं की तरह बिल्कुल नहीं है। शास्त्रों में इनका जो वर्णन मिलता है, उसके अनुसार ये गले में मुंडमाला धारण किए हुए हैं। आज हम आपको इनके अंपरमपार रूप के बारे में ही बताने वाले हैं कि आखिर ये अपने गले में मुंडमाला क्यों धारण करते हैं। जैसे कि सब जानते हैं कि भगवान भोलेनाथ का जो रूप शास्त्रों आदि में चित्रित मिलता है उसके अनुसार देवों के देव महादेव अपने शरीर पर त्रिशूल, नाग, चन्द्रमा और मुंडमाला जैसी कई चीजों को धारण करते हैं। पुराणों में कहा गया है कि जो भी भगवान भोलेनाथ जो अपने शरीर पर धारण करते हैं, उसके भी पीछे कोई न कोई रहस्य छुपा हुआ होता है। तो आइए जानते हैं कि भगवान शिव मुंडमाला क्यों धारण करते हैं, तथा इसकी वजह क्या है-

यह है भगवान भोलेनाथ की मुंडमाला का रहस्य:
भगवान भोलेनाथ के गले में धारण मुंडमाला इस बात की प्रतीक है कि भगवान भोलेनाथ मृत्यु को भी अपने वश में किए हुए हैं। अन्य किंवदंतियों की मानें तो भगवान शिव के गले की यह मुंडमाला भगवान शिव और माता सती के प्रेम का प्रतीक भी है।मान्यता हैं कि एक बार नारद मुनि के उकसाने पर माता सती ने भगवान भोलेनाथ से 108 शिरों वाली इस मुंडमाला के रहस्य के बारे में हठ करके पूछा, भोलेनाथ के लाख मनाने पर भी जब माता सती नहीं मानी तब भोलेनाथ ने इसके रहस्य को माता सती से बताया।

उन्होंने बताया कि मुंडमाला के ये सभी सिर यानि 108 सिर आप ही के हैं। इससे पहले आप 107 जन्म लेकर अपना शरीर त्याग चुकी हैं, यह आपका 108वां जन्म है। ये सुनने के बाद देवी सती ने अपने शरीर को बार बार त्यागने का कारण पूछा कि केवल मैं ही अपने शरीर का त्याग करती हूं, आप क्यों नहीं। इस पर भोलेनाथ के कहा कि मुझे अमरकथा का ज्ञान है इसलिए मुझे बार-बार शरीर का त्याग नहीं करना पड़ा। इस पर देवी सती ने भगवान शंकर से अमरकथा सुनने की इच्छा प्रकट की।

ऐसा कहा जाता है कि जब शिव जी अमरकथा सुना रहे थे तो माता कथा के बीच में ही सो गईं जिस कारण उन्हें अमरत्व की प्राप्ति नहीं हो पाई। जिसके परिणाम वश परिणाम देवी सती को अपने पिता राजा दक्ष के यज्ञ कुंड में कूदकर आत्मदाह करना पड़ा था।