ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

सुदीप बेनर्जी—कवि, नाटककार, अभिनेता, संवेदनशील, वामपंथी रुझान, डिबेट और आइएएस।समावर्तन में डॉ. हरीश पाठक के एक लेख में उल्लेख है कि उन्हें यह गीत पसंद था—“कश्ती का ख़ामोश सफ़र है शाम भी है तन्हाई भी, दूर किनारे पर बजती है, लहरों की शहनाई भी....आज मुझे कुछ कहना है !” कश्तियों के सफ़र बहुत छोटे होते हैं।सुदीप जी का सफ़र भी ऐसा ही था—65 बरस का ! सुदीप भाईसा’ब की पुण्य स्मृति को सदर नमन।10 फ़रवरी 2009 को उनका अवसान हुआ था और 16 अक्टूबर 1946 को जन्म।जब वे रतलाम कलेक्टर थे, तो हमारे दो नाटकों के उन्होंने रतलाम में शो कराए और हमें पैसा भी दिलाया।यही नहीं, दिशा भी दी।

भोपाल के सबसे बड़े पत्रकार श्री मदनमोहन जोशी, जिनकी राजनीति, सरकार, प्रशासन और समाज में धमक थी—उनसे मुझे मिलवाया।फिर जिन्होंने मुझे पत्रकार बनाया।आज सुदीप जी पर स्टेट्समैन के राजू संथानम और टाइम्स ऑफ़ इंडिया के जीवीके के लेख पढ़े।एक लेख एनके सिंह का पड़ा, जो दस साल पहले हिंदुस्तान टाइम्स में छपा था।सुदीप जी पर ये तीनों लेख काफ़ी अच्छे लगे।किसी ने लिखा कि अर्जुन सिंह पर उनका गहरा प्रभाव था।सर्वहारा के हित में अनेक फ़ैसले उन्होंने अर्जुन सिंह से कराए।जिनमें झुग्गी पट्टा  अधिनियम 1984 भी सम्मिलित है।तेंदूपत्ता अधिनियम में संशोधन कर इसमें से बिचौलियों को हटाने का प्रावधान भी इसी श्रृँखला की कड़ी था।

एनके सा’ब के लेख में ये पंक्तियाँ संभवत: सुदीप जी की ही हैं, जिसमें वे कह रहे है कि—“आप वर्तमान सिस्टम से उम्मीद तो नहीं कर सकते, लेकिन सही दिशा में एक क़दम उठा सकते हैँ।इसी प्रकार से जब आप ग़रीबों के लिए कोई क़ानूनी प्रावधान करते हैं, तो कोई उस क़ानून को बदलने की हिम्मत नहीं करेगा।” साहित्य परिषद (अब साहित्य अकादमी) में उन्होंने कई अच्छी शुरुआत कीं।इसी प्रकार से जनसम्पर्क विभाग में भी वे याद किए जाएँगे।यदि वे इतनी जल्दी नहीं गए होते तो हिंदी की कविता और समृद्ध होती।