ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

खेलों में मेरे दो बड़े अच्छे पुराने मित्र हैं— असलम शेर ख़ान साहब और अशोक ध्यानचंद जी।असलम भाई ने कल रात मुझे एक पोस्ट के ज़रिए बताया कि आज ओलिंपिक दिवस है। उन्होंने मुझे एक दस्तावेज भी शेयर किया है, जिसमें हॉकी के बारे में काफ़ी दिलचस्प जानकारियाँ हैं।मसलन असलम भाई के वालिद साहब अहमद शेर ख़ान साहब हॉकी के जादूगर मेजर ध्यान चंद ‘दद्दा’ के साथ 1936 में बर्लिन ओलिंपिक में हॉकी का स्वर्ण पदक जीतकर लाए थे।कप्तान मेजर ध्यानचंद थे।
इसी प्रकार से 1972 में म्यूनिख ओलिंपिक में इन दोनों के सुपुत्र असलम भाई और अशोक कुमार जी हॉकी का कांस्य पदक जीते थे।कप्तान थे हरमीक सिंह।1975 में इस जोड़ी ने पहली बार हॉकी का विश्वकप जीता। इस टीम के कप्तान अजीतपाल सिंह थे।असलम भाई और अशोक कुमार जी की जोड़ी ने 1976 में मांट्रियल ओलिंपिक में भी अपनी स्टिक का जादू दिखाया। इस बार भी कप्तान थे अजीत पाल सिंह।
हॉकी में पिता-पुत्र की तीसरी जोड़ी अजीतपाल सिंह और उनके बेटे गगन अजीत सिंह की है।गगन ने 2000 में सिडनी और 2004 में एथेंस ओलिंपिक में भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया।इसी प्रकार से पिता-पुत्र की चौथी जोड़ी भी है।वेस पेस और उनके पुत्र लिएंडर पेस।वेस पेस 1972 में म्यूनिक ओलिंपिक में भारतीय हॉकी टीम में शामिल थे और उनके पुत्र लिएंडर ने टेनिस में इतिहास रचा।
इस दस्तावेज़ में अशोक कुमार जी ने बताया कि पुराने ज़माने में हिंदुस्तान के साथ खेलने से दूसरे देश घबराते थे।1928 से 1936 तक इंग्लैंड ओलिंपिक हॉकी में नहीं उतरा।उसे ग़ुलाम भारत से पराजय का भय था।
मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने जब अपने पिछले कार्यकाल में मध्य प्रदेश में हॉकी अकादमी की स्थापना की, तो उन्होंने इसमें प्रशिक्षण देने के लिए अशोक कुमार जी को आमंत्रित किया।कभी वे मुझे भी बुला लिया करते थे।तब मैं दैनिक “नवभारत”, भोपाल में संपादक था।मेरी उनसे पहली मुलाक़ात संभवत: 1993 में गुना में हुई, जब वे वहाँ हॉकी के एक नेशनल टूर्नामेंट के फ़ाइनल में मुख्य अतिथि के रूप में आए थे।तब मैं गुना में हिंदी दैनिक नईदुनिया, इंदौर ग्रुप के एक नए दैनिक समाचार पत्र—“मध्यक्षेत्र” का संपादक था और इस कार्यक्रम में आमंत्रित भी था।यों मैं कभी खिलाड़ी नहीं रहा और कई खेल अधूरे छोड़ दिए, लेकिन खेल देखने, उस पर लिखने और खेलों पर होने वाली न्यूज़ चैनलों की डिबेट में पूरी दिलचस्पी लेता था।
गुना की इस मुलाक़ात में अशोक कुमार जी से काफ़ी बातचीत हुई और ये सिलसिला भोपाल में भी चला।मुझे लगता है कि मध्य प्रदेश सरकार ने हॉकी की इस संस्था का गठन करने के बाद जिस प्रकार से उस पर ध्यान देने की आवश्यकता थी, वैसा ध्यान बिलकुल नहीं दिया गया है। हालाँकि मैं यह मानता हूँ कि मध्यप्रदेश में शिवराज जी के समय में खेलों के सँरक्षण और सँवर्द्धन में पिछली सरकारों की तुलना में बेहतर कार्य हुआ है।लेकिन एक तो उसकी गुणवत्ता नहीं थी और न ही इन कार्यों में निरंतरता थी।
भोपाल हॉकी का गढ़ रहा है और यहाँ अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ियों की कभी कमी नहीं रही।आज़ादी के पहले से भोपाल में हॉकी की दीवानगी थी।जलालुद्दीन साहब और समीर दाद जी भी मेरे मित्र हैं। दोनों हॉकी के ओलिंपियन हैं।समीर भाई भोपाल के आख़िरी ओलिंपियन हैं।इसके बाद हॉकी की ऐसी राजनीति चली कि फिर भोपाल से ओलिंपियन प्लेयर निकलना बंद हो गए।
पूर्व में मुईनुद्दीन भी एक अच्छे खिलाड़ी थे।उनके बेटे शरीफ़उद्दीन हैं।उनके एक पुत्र शाहबाज़उद्दीन रेलवे की तरफ़ से खेलते हैं और दूसरे पुत्र हसीबउद्दीन अकादमी से प्रशिक्षण ले रहे हैं।
पर इस बीच एक अच्छा काम शिवराज जी के राज में और हो गया।2006 में ग्वालियर में महिला हॉकी के लिए एक अकादमी की स्थापना की गई।इसमें से पहली नेशनल प्लेयर निकली ख़ुशबू  ख़ान, जिन्होंने बाद में भोपाल की पहली महिला अंतरराष्ट्रीय हॉकी खिलाड़ी बनने का गौरव प्राप्त किया।वे भोपाल के जहांगीराबाद की झुग्गी में रहती हैं।ख़ुशबू का चयन अंडर-23 जूनियर हॉकी टीम के लिए किया गया।यह बात दो साल पुरानी है।उन्होंने अपना पहला अंतरराष्ट्रीय मैच बेल्जियम में खेला था।वे गोलकीपर हैं।ख़ुशबू अच्छा खेल रही हैं और वे अपने इस खेल का श्रेय अशोक कुमार को देती है।ख़ुशबू ने ग्वालियर से पूर्व भोपाल की पुरुष हॉकी अकादमी में अशोक कुमार से प्रशिक्षण प्राप्त किया था।उन्होंने ग्वालियर के मेजर ध्यानचंद स्टेडियम और भोपाल के ऐशबाग स्टेडियम में अपने खेल को सँवारा है और उसमें निखार आता जा रहा है।खुशबू के पिताजी भोपाल में ऑटो रिक्शा चलाते हैं।
असलम भाई कांग्रेस के बहुत वरिष्ठ नेता हैं और उनकी बहुत साफ़ छवि है।कांग्रेस में उन्होंने हमेशा स्पष्ट बातें कहीं और बिलकुल खरी-खरी।जब उन्हें कांग्रेस में सब-कुछ ठीक नहीं लगा, तो उन्होंने कांग्रेस को छोड़ा भी।वे पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के काफ़ी निकट थे और एक समय उनके मंत्रिमंडल में सदस्य भी रहे हैं।
राज्य सरकार को चाहिए कि वह मध्य प्रदेश की हॉकी को और आगे बढ़ाने के लिए असलम शेर ख़ान का मार्गदर्शन भी ले।ग्वालियर में महिला हॉकी और भोपाल में पुरुष हॉकी के विकास के लिए कुछ समय कोच की कमान असलम भाई को दी जानी चाहिए।उनके अनुभवों का लाभ निश्चित रूप से हमारे नये खिलाड़ी ले सकते हैं।