200 करोड़ के भवन निर्माण के उद्घाटन समारोह के अवसर पर बोलते समय मंत्री नितिन गडकरी के वक्तव्य से उनके हृदय की पीड़ा झलकती है। उन्होंने कहा सामान्यता उदघाटन के अवसरों पर शाबाशी देने की परम्परा है लेकिन वे शर्म महसूस कर रहे हैं कि इस भवन को पूर्ण करने मे दो सरकारें, आठ चेयरमैन व नौ साल का समय लगा । उन्होंने इसकी विस्तार से स्टडी करने व विलम्ब के लिये जिम्मेदार अधिकारियों के फोटो अपने कार्यालय में लगाने की बात कह कर एक बहुत ही महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान आकर्षित कराया है।

प्रश्न है कि क्या हमारी नौकरशाही पारदर्शिता, कर्तव्यनिष्ठता, कर्तव्य परायणता से काम करेगी या अनावश्यक क्वेरी कर महत्वपूर्ण मुद्दों को विलम्बित करती रहेगी व वही निर्णय/प्रास्तावों को कभी कभी कई वर्षों के विलम्ब के बाद कपितय कारणों के चलते मान्य करेगी। क्या उंचे पदों पर बैठे अधिकारीगढ़ की कोई जिम्मेवारी या उत्तरदायित्व नही है, क्या वह मात्र अधिकार तो अपने पास रखेंगे लेकिन उससे जुड़ी जिम्मेदारी का निर्वहन से उनका कोई सरोकार नही है।

क्या उंचे पदो पर सुशोभित अधिकारियों से लंबे अनुभव, उच्च क्षमता के आधार पर अच्छे निर्णय को शीघ्र लेने एवं क्रियान्वयन करने की क्षमता की अपेक्षा करना गलत है? क्या उच्च पदों पर विराजित यह अधिकारी अच्छे कार्य के लिये क्रेडिट तो लेंगे पर गलतियों का दोष किसी अन्य पर मढ़ कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे?

कई बार कनिष्ठ अधिकारियों को चर्चा के लिये नस्ती मार्क करना निर्णय न लेने की स्ट्रेटेजी के बतौर उपयोग किया जाता है। अत: पारदर्शिता के लिये चर्चा में कितना समय लगा व चर्चा क्या हुई इसका पूर्ण विवरण  विस्तार से नस्ती में उल्लेखित होना चाहिये।

समय आ गया है कि अब प्रत्येक अधिकारी का आंकलन उसके वरिष्ठ अधिकारियों की बजाय आर्टीफिसियल इंटेलीजेंस के माध्यम से किया जाये व हम आसानी से इनके फरफोरमेंस की इंडैक्स जनरेट भी कर सकेंगे। यदि शासन चाहे तो मैं इस कार्य में शासन की मदद् कर सकता हूँ।

पर क्या शासन ऐसा चाहेगा या वर्तमान व्यवस्था उन्हें ज्यादा रास आ रही है क्यौंकि उनके तो सभी काम आसानी से पूरे हो रहे हैं केवल आम जनता परेशान हो रही है विलंबित निर्णयों से प्रोजेक्ट्स की कीमत बढ़ती है  व इस प्रकार ठेकेदारों को लाभ पहुचाया जा रहा है व इससे राष्ट्र के होने वाले नुकसान (cost overrun and time overrun) से किसी का कोई सरोकार नही है

आओ हम मिलकर अपराध मुक्त एवं पारदर्शी भारत के तहत एक अच्छी व्यवस्था को स्थापित करें। हमारे पुलिस अधिकारियों एवं नौकरशाहों का पारदर्शी तरह से परफोरमेंस का आंकलन सुनिश्चित किया जाये।
(मैथिली शरण गुप्त सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक [पुलिस सुधार], मप्र शासन, भोपाल और क्राइम-फ़्री भारत मिशन, भोपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)