हमें समझना होगा कि हमारी पुलिस को 1861 के पुलिस एक्ट के द्वारा अंग्रेजी साम्राज्य ने प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के बाद की स्थिति को कुचलने के लिये बनाया था, इस एक्ट से निर्मित पुलिस के द्वारा अपने निर्माता का मकसद पूरे 86 वर्ष समर्पण से निभाया। सोच का विषय है कि स्वतंत्र भारत के राजतंत्र को भी यह इतिहासिक तंत्र अत्यंत रास आ रहा है व ऐसे प्रभावी खिलौने को आज का राजनेता भी नही खोना चाहते है यह विडम्बना का विषय है पुलिस सुधार की सोच मात्र से राजतंत्र की रूह कांप जाती है अन्यथा 1978 के राष्ट्रीय पुलिस कमीशन, रिबेरो कमेटी (1998-99), पदोमनाभैया कमेटी (2000) आदि की तमाम अनुसंशाओं का यह हश्र न होता।

क्या कारण है कि आज के राजनेता पुलिस सुधार के नाम से ही भयक्रांत हो जाते हैं? और ऐसा क्यों न हो जिस तंत्र ने इतनी शिद्दत से अंग्रेजी शासन का साथ दिया हो भला उसे आसानी से छोड़ना नितांत मूर्खता ही होगी यह तथ्य हमारे राजनेताओं को भलीभांति समझ में आ गया है फिर सुधार के लिये कोई दबाब भी तो नहीं है फिर भला दूध देती गाय को क्यों छोड़ा जाये।

सोचने का विषय है कि गृह विभाग के द्वारा साइबर अपराधों के लिये बनायी गयी बैबसाइट पर पिछले एक साल में 2 लाख से अधिक शिकायतें प्राप्त हुईं है उसमें से मात्र 2.5 प्रतिशत में ही प्राथमिकी दर्ज होने पर भी जनता के धैर्य में कोई कमी नही आयी हमारी जनता के इस धैर्य की प्रशंसा करनी ही होगी। यही धैर्य ही हमें नपुंशक बना रहा है अन्यथा यह राजनेता हमारी ऐसी दुर्दशा करने की जुर्रत कभी नही करते।

विचारक कहते हैं कि क्या करें पुलिस तो राज्य शासन के अधिकार क्षेत्र में आता है भला इसमें केन्द्र शासन कर भी क्या सकता है। तब विचारण का विषय यह है कि क्या राज्य शासन नियमों से बंधी नही है क्या उसकी इस स्वछंदता का कोई उपचार संविधान बनाने वाले करना भूल गये है? हमारे संविधान के निर्माताओं को मालूम था कि सत्ता के लालची यह भेड़िये अपने हित को सर्वोपरि ही रखेंगे उन्हें जनता की दुख तकलीफों से कोई सरोकार नही होगा।

तो क्या इसका कोई उपचार नही है? इस अराजकता को झेलना ही हमारी नियति है?

आपको सुरक्षा देना हर शासन का सार्वभौमिक दायित्व है यदि आम जनता की रिपोर्ट भी नही लिखी जा रही है तो निश्चित रूप से यह संवैधानिक तंत्र के फैल होने के प्रमाण है व इसके लिये संविधान की कंडिका 356 में संविधान निर्मातओं ने ऐसी सरकारों को भंग करने का प्रावधान पहले से है।

सभी राजनेता एक ही थैले के चट्टे बट्टे है वे जनता के हित को दरकिनार रख कर एक दूसरे के हित साधने में लगे हैं अत: समय आ गया है कि हे पार्थ उठो व गाड़ीव उठाओ हमें यह धर्मयुद्ध करना ही होगा अन्यथा आने वाली पीड़ियां हमें कायर व शिखंडी कहेंगी। जय हिन्द। जय भारत।
(मैथिली शरण गुप्त सेवानिवृत्त विशेष पुलिस महानिदेशक [पुलिस सुधार], मप्र शासन, भोपाल और क्राइम-फ़्री भारत मिशन, भोपाल के राष्ट्रीय अध्यक्ष  हैं।)