ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

उपचुनाव-जीत के बाद विभाग-प्रकोष्ठ किए भंग

हाईकमान का पूरा सपोर्ट है, तो फिर डर काहे का

दतिया और विजयपुर की सीटें बचाने में रहे सफल 

भोपाल। मध्य प्रदेश के दतिया विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस प्रत्याशी घनश्याम सिंह की 6016 मतों से विजय से प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष और इंदौर ज़िले के पूर्व विधायक जीतू पटवारी को संजीवनी मिल गई है। इससे पूर्व विजयपुर विधानसभा क्षेत्र से भी कांग्रेस ही जीती थी। ये दोनों उपचुनाव थे और इन दोनों पर ही कांग्रेस ने अपना क़ब्ज़ा बनाए रखा है। इससे पटवारी की स्थिति और बेहतर हो गई है। क्योंकि अब उनके ख़िलाफ़ कोई ऐसी बात नहीं है कि कोई कुछ कहे है। 

विजय की ताक़त मिलने के बाद पटवारी ने कांग्रेस के विभाग और प्रकोष्ठों भंग कर दिए हैं। हालाँकि इसका औचित्य अभी तक प्रतिपादित नहीं हुआ है कि ऐसा क्या हो गया था कि इन्हें भंग कर दिया जाए। मज़े की बात यह है कि ख़ुद जीतू पटवारी ने ही इन विभागों और प्रकोष्ठों का गठन किया था। हो सकता है कि वे इनमें कुछ परिवर्तन करना चाहते हों, पर अध्यक्ष के नाते वे अभी भी ये कर सकते थे। याने इन्हें भंग किए बिना भी इसमें जोड़-भाग किया जा सकता था। लेकिन उन्होंने तो सभी भंग कर दिए। तो क्या इसका यह अर्थ हुआ कि वे सभी विभागों और प्रकोष्ठों में आमूलचूल परिवर्तन करना चाहते हैं। अध्यक्ष के नाते इसके लिए वे स्वतंत्र भी है और उनके पास इसके अधिकार और शक्तियां भी हैं। इसलिए अब उन्होंने इसका खुलकर उपयोग किया है और यह संदेश भी दिया है कि वे अब और मज़बूत बनकर उभरे हैं।

मगर इन दो चुनाव परिणामों के पहले भी पटवारी पार्टी में मज़बूत थे, क्योंकि वे हाईकमान और ख़ासकर राहुल गांधी की गुड बुक में हैं। एक समय वे इंदौर ज़िले में विधानसभा चुनाव जीतने वाले कांग्रेस के अकेले नेता थे। इसका उन्हें फ़ायदा मिला और वे कैबिनेट मंत्री बन गए। वह भी पहली बार विधानसभा पहुँच कर। तब कमलनाथ मुख्यमंत्री थे। यह बात अलग है कि सवा साल बाद ज्योतिरादित्य सिंधिया ने भाजपा से हाथ मिलाकर कमलनाथ की सरकार को गिरा दिया था।

अब मध्य प्रदेश में अगले विधानसभा चुनाव के पहले नगर निकाय और पंचायत के चुनाव होंगे। जीतू पटवारी की असली परीक्षा इन्हीं चुनावों में होगी। भाजपा के राज में आज कोई यह दावा तो नहीं कर सकता कि इन चुनावों में कांग्रेस शत-प्रतिशत जीत हासिल करेगी। लेकिन अगर पटवारी ने आधे महापौर और नगर पालिकाध्यक्ष जितवा लिए, तो फिर 2028 का विधानसभा चुनाव भी उन्हीं के नेतृत्व में लड़ा जाएगा। केवल उपचुनाव ही इसका पहला और आख़िरी मापदंड नहीं होगा। अब यह देखना बाकी है, कि तब तक क्या स्थिति बनती है। 

अगला विधानसभा चुनाव जीतू पटवारी के नेतृत्व में ही लड़ा जाए, इसके लिए एक विषय और है और वह है समन्वय का और जुड़ने का। जीतू पटवारी युवा हैं, इसलिए उन्हें युवाओं से ख़ुद को कनेक्ट करना होगा। या ख़ुद ही युवा उनसे कनेक्ट हों। एक बात तो यह है। दूसरी बात यह है कि प्रदेश के वरिष्ठ नेताओं से उनकी कैमिस्ट्री बैठना चाहिए। याने उनका वरिष्ठ नेताओं के साथ सम्यक समन्वय स्थापित होना बहुत आवश्यक है। वरिष्ठ नेता याने कमलनाथ और दिग्विजय सिंह। नेता प्रतिपक्ष उमंग सिंघार भी एक फैक्टर हैं। उनके साथ भी क़दमताल आवश्यक है। यह सब कुछ सभी कुछ समय से रुक कर देखना होगा।