ज्यों-की-त्यों धर दीन्हि चदरिया

राजेंद्र माथुर का पुण्‍य स्मरण

स्वाधीनता के बाद की हिंदी पत्रकारिता के अग्रदूत और समादृत सम्पादक राजेन्द्र माथुर साहब, जो रज्जू बाबू के नाम से सुविख्यात थे; आज उनकी 35 वीं पुण्यतिथि है। 1991 का वर्ष बड़ा दु:ख-दीन्हा था। 1991 में ही पाँच माह बाद सितम्बर की 5 तारीख को शरद जोशी जी भी सदा के लिए चले गए। पाँच वर्ष बाद शरद जी का और नौ वर्ष बाद रज्जू बाबू का जन्म शताब्दी वर्ष है। 
कदाचित 1955 के आसपास की बात है, नईदुनिया, इंदौर के सम्पादकीय विभाग में शरद जी ने रज्जू बाबू को राहुल बारपुते जी, याने बाबा से मिलवाया था।
शरद जी और माथुर साहब में प्रगाढ़ मित्रता थी। शरद जी ने नईदुनिया में व्यंग्य लिखना प्रारंभ कर दिया था। उनके बाबा से अच्छे रिश्ते थे। बाबा उनसे 9 साल और माथुर साहब से 13 साल बड़े थे। 2022 में बाबा की जन्म शताब्दी निकल गई, खामोशी से ! कुछ नहीं हुआ। हमेशा की तरह एक दिन एक साल निकल गया ! कोई कुछ करता भी , तो क्या करता ? किसी का भाषण हो जाता ! और उसमें तो हम सभी निष्णात हैं ! हम गाल बजाते। ढोल तो हम बजा ही रहे हैं !  न बजाएँ, तो कोई विकल्प नहीं है। क्या करें। खैर। यह अलग ही पूरा विषय है। इसके बारे में यहाँ पर यदि विस्तार से लिखा, तो सब घिचपिच हो जाएगा। मूल प्रश्न यह है कि बाबा की जन्म शताब्दी चुपचाप गुज़र जाए और पता भी न चले, तो क्या यह युद्ध अपराध से कम है ?क्या देश, मध्यप्रदेश या मालवा में यह क्षम्य हो सकता है ? 
अभी मुझसे किसी ने कहा की कुछ पुरस्कार यदि बंद हो गए हैं, तो हिंदी पत्रकारिता में कौन-सा भूचाल आ गया है ? वैसे भी पुरस्कारों की संख्या इतनी हो गई है कि लोग कम पड़ जाएँगे। जो बेचारे संपादकी जानते तक नहीं, श्रेष्ठ संपादक के सम्मान से नवाज़े जा रहे हैं। उन्होंने तो कहा भी नहीं था कि हमें नवाज़ो। माफ़ कीजिएगा। मैं अपने यहाँ की बात नहीं कर रहा हूँ। यह कहानी कहीं और की है। हाँ, है
इसी ग्रह की, पृथ्वी लोक की ही है। पर दूर देश की है। आप बुरा मत मानिएगा। मैं भी किसी पचड़े में पड़ना नहीं चाहता। विषयांतर हो गया ! खैर !
राजेन्द्र माथुर साहब इसलिए याद किए जाएँगे, क्योंकि उन्होंने गंभीर, निर्भीक और सार्थक पत्रकारिता की, उसे आगे बढ़ाया, उसकी एक पीढ़ी तैयार की तथा पत्रकारिता को संस्कारित भी किया। यदि आज बीहड़, बियाबान और बदशक्ल पत्रकारिता के बीच आपको बाबा एवं रज्जू बाबू की पत्रकारिता की पहचान है, तो आपको अभी कुछ-कुछ वैसा लिखने वाले मिल जाएँगे।उस स्वर्णकाल का थोड़-सा सोना अभी बचा है। चौबीस कैरेट, सौ टंच, हालमार्क, बिना डंडी मारे !